पोते की मौत का गम न सह सके दादा-दादी, 9 दिन में 3 जिंदगियां खत्म; हापुड़ के परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

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 जिस आंगन में कुछ दिन पहले पोते की हंसी गूंजती थी, वहां अब सिसकियां हैं। जिस दादा की आंखों में पोते के सुनहरे भविष्य के सपने थे, वह पोते की मौत का सदमा नहीं सह सके।

और जिस दादी के लिए पोता आंखों का तारा और पति जीवन का सहारा था, दोनों के जाने के बाद वह भी जिंदगी से हार गईं। एक ही परिवार पर ऐसा दुखों का पहाड़ टूटा कि महज नौ दिनों में पोता, दादा और दादी तीनों हमेशा के लिए बिछड़ गए।

पोते की मौत के दो दिन बाद दादा ने भी छोड़ी दुनिया
नगर के पक्का बाग नई मंडी निवासी व्यापारी नीरज कंसल के बेटे देव कंसल की एक सितंबर को अचानक मौत हो गई थी। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद देव बीकाॅम में दाखिला लेने की तैयारी कर रहा था।

परिवार ने उसके भविष्य को लेकर तमाम सपने संजो रखे थे। दादा जयगोपाल कंसल और दादी राजबाला कंसल के लिए तो देव महज पोता नहीं, उनकी आंखों का तारा था। देव की मौत ने परिवार की खुशियां पलभर में छीन लीं।

अभी पोते की मौत का गम ताजा ही था और घर में मातम पसरा था कि दो सितंबर की रात दादा जयगोपाल की तबीयत बिगड़ गई। परिवार उन्हें लेकर अस्पताल पहुंचा, लेकिन चिकित्सकों के प्रयास के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। तीन सितंबर को जयगोपाल कंसल भी पोते के पीछे दुनिया छोड़ गए।

पोते और पति के जाने के बाद टूट गईं राजबाला

दोनों मौतों ने राजबाला कंसल को भीतर तक तोड़ दिया था। एक तरफ आंखों के सामने पोते देव की तस्वीर थी तो दूसरी ओर जीवनभर का साथ निभाने वाले पति जयगोपाल की यादें।

जिस घर में कुछ दिन पहले तक देव की पढ़ाई और भविष्य की बातें होती थीं, उसी घर में अब दो तस्वीरों के सामने आंसू बह रहे थे। राजबाला की तबीयत बिगड़ने पर स्वजन उन्हें उपचार के लिए मेरठ के न्यूटिमा अस्पताल ले गए।

चिकित्सकों ने उन्हें बचाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन बुधवार नौ सितंबर की देर रात राजबाला कंसल ने भी अंतिम सांस ले ली। पति और पोते के गांव में ही उन्होंने भी अंतिम विदाई ली और मानो दोनों के पास ही चली गईं।

नौ दिनों में तीन पीढ़ियां उजड़ गईं

देव के जाने के बाद परिवार को संभालने के लिए दादा-दादी ही तो थे। लेकिन देव के बाद दादा भी चले गए और फिर दादी ने भी साथ छोड़ दिया।

एक सितंबर को पोता, तीन सितंबर को दादा और नौ सितंबर की रात दादी… नौ दिनों के भीतर एक ही परिवार की तीन जिंदगियां खत्म हो गईं। स्वजन की आंखों में अब आंसू हैं और सामने देव, जयगोपाल और राजबाला की तस्वीरें।

परिवार के लिए यह सिर्फ तीन मौतों का दुख नहीं, बल्कि कुछ ही दिनों में उजड़ गई तीन पीढ़ियों की कहानी है। जिस पोते के लिए दादा-दादी ने जीवनभर सपने देखे, अंत में वही पोता उन्हें ऐसी दूरी दे गया, जहां से कोई लौटकर नहीं आता।

घर में अब भी देव की आवाज तलाशती निगाहें हैं… दादा की छड़ी और दादी की ममता की यादें हैं। लेकिन तीनों नहीं हैं।

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