चलती ट्रेन से गिरे बेटे की मौत, 15 साल बाद मां को मिला; पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने दिया मुआवजे का आदेश

2.0kViews
1198 Shares

चलती ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले राकेश की मां को आखिरकार न्याय मिल गया। करीब 15 साल पुराने इस मामले में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने रेलवे दावा अधिकरण के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें मुआवजे का दावा ठुकरा दिया गया था।

हाई कोर्ट ने साफ कहा कि यात्री की महज लापरवाही रेलवे को वैधानिक मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती। अदालत ने मृतक के पास से मिले रेल टिकट को वास्तविक यात्री होने का अहम प्रमाण माना और उसकी मां को मुआवजा देने का आदेश दिया।

मामला तीन जुलाई 2011 का है। राकेश यात्री ट्रेन से जींद से बहादुरगढ़ जा रहा था। भारी भीड़ और ट्रेन के अचानक झटके के कारण वह चलती ट्रेन से नीचे गिर गया और उसकी मौत हो गई। घटना के बाद राजकीय रेलवे पुलिस, रोहतक में उसी दिन डीडी दर्ज की गई। मृतक की तलाशी के दौरान रेल टिकट बरामद हुआ। यह टिकट संख्या 37827565 था और उसे वास्तविक पाया गया था।

रेलवे दावा अधिकरण ने हालांकि मुआवजे का दावा खारिज कर दिया था। अधिकरण का मानना था कि राकेश के वास्तविक यात्री होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है।

इसके साथ ही रेलवे की विभागीय जांच और गार्ड के बयान के आधार पर यह माना गया कि वह चलती ट्रेन में दूसरी तरफ से चढ़ने की कोशिश कर रहा था। मृतक के पिता को दावेदार नहीं बनाए जाने को भी दावा खारिज करने का आधार बनाया गया था।

मृतक के पास से बरामद हुआ था टिकट

जस्टिस हरकेश मनुजा ने कहा कि मृतक के पास से टिकट बरामद हुआ था और उसे फर्जी नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने पाया कि राकेश के ट्रेन से गिरने की घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। गार्ड ने भी उसे ट्रेन में चढ़ते हुए नहीं देखा था।

उसका बयान अन्य यात्रियों से मिली जानकारी पर आधारित था। रेलवे के रिकार्ड में भी ट्रेन को लेकर विसंगति सामने आई। ऐसे में केवल अनुमान के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मृतक जानबूझकर चलती ट्रेन में चढ़ रहा था।

अदालत ने कहा कि यात्री की सामान्य लापरवाही को ‘स्वयं कारित चोट’ नहीं माना जा सकता। रेलवे कानून की व्यवस्था बिना गलती साबित किए मुआवजा देने के सिद्धांत पर आधारित है। इसलिए केवल लापरवाही का आरोप लगाकर रेलवे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

मां अभिभावक श्रेणी में आती है: हाई कोर्ट

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतक की मां कानून के तहत आश्रित अभिभावक की श्रेणी में आती है। पिता को दावेदार नहीं बनाने के कारण मां का पूरा दावा खारिज नहीं किया जा सकता। यदि कोई अन्य व्यक्ति भी मुआवजे का हकदार है तो राशि का उचित बंटवारा किया जा सकता है।

हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए रेलवे दावा अधिकरण का 19 सितंबर 2016 का फैसला रद कर दिया। रेलवे को चार लाख रुपये पर नौ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज, दावा दायर करने की तारीख से भुगतान तक देने का आदेश दिया गया है।

यदि ब्याज सहित यह राशि आठ लाख रुपये से अधिक होती है तो अधिक राशि देनी होगी। रेलवे को आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर रकम जमा करनी होगी। देरी होने पर तीन महीने बाद 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *