उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज की शान कॉफी हाउस में सन्नाटा पसरा है। यहां तीन महीने से ताला लटक रहा है और यहां पर बैठ कर कॉफी और चाय की चुस्की लेने वाले निराश लौट रहे हैं।
यह कॉफी हाउस बुद्धिजीवियों, कवियों, लेखकों, सामाजिक-कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और कलाकारों का भी मुख्य अड्डा हुआ करता था। एक कप कॉफी के साथ प्रदेश और देश स्तर की बड़ी-बड़ी बातों पर निष्कर्ष निकाला जाता था। यहां चार रुपये से शुरू हुई काफी 50 रुपये तक पहुंची। फिलहाल, यह वीरान हो गया है।
कॉफी हाउस में यूपी की सियासत के लोगों की बैठकी होती थी, तो पत्रकार-साहित्यकार भी जमे रहते थे। मोबाइल फोन के जमाने से पहले पॉलिटिकल खबरें यहीं से निकलती थीं। इस कॉफी हाउस की दीवारें यूपी की पल-पल की बदलती सियासी तस्वीरों की गवाह हैं। पूर्व पीएम जवाहर लाल नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी ने यहां कॉफी पी। यूपी के पूर्व सीएम वीर बहादुर सिंह ने अपने कार्यकाल को पूरा किए बिना इस्तीफा दिया तो सबसे पहले यहीं पहुंचे थे। मुलायम सिंह यादव भी यहां कॉफी पीते थे।
कभी यहां राजनीति पर चर्चा गर्म होती है। यहां पर नेताओं की आपस में संजीदगी के साथ आपस में गर्मागर्म बहस भी होती है। कई दशक तक पूर्व महापौर डा दाऊजी गुप्ता का नियमित यहां आना होता था। वो कॉफी तो नहीं पीते थे, लेकिन यहां की बहस में शामिल होने के साथ मौजूद सभी को कॉफी पिलाते थे। उनके निधन के बाद ऐसे कई चेहरे भी दिवंगत हो गए जो कॉफी हाउस की शान होते थे।
पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी आए कॉफी हाउस
पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ राम मनोहर लोहिया, जनेश्वर मिश्र, राज नारायण, फिरोज गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीज, पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह, नारायण दत्त तिवारी और आचार्य नरेंद्र देव ने यहां की शोभा बढ़ाई। साहित्यकार अमृतलाल नागर, यशपाल, मजाज लखनवी, पूर्व नगर प्रमुख डॉ पीडी कपूर और मदन मोहन सिद्धू भी यहां की रौनक रहे। कुछ तो नियमित थे, जिसमें वीर बहादुर सिंह भी थे। मुलायम सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी यहां आ चुके थे।
पूर्व मंत्री लालजी टंडन को कॉफी हाउस बहुत प्रिय
लालजी टंडन को कॉफी हाउस बहुत प्रिय था। उनके समय में जब भी संकट आया तो उन्होंने यहीं बैठकर समाधान निकाला। लालजी टंडन ने अपनी राजनीति की शुरुआत कॉफी हाउस से ही की थी। लालजी टंडन कहा करते थे- यह मेरी राजनीति की पाठशाला है और यह पाठशाला चलती रहनी चाहिए। 1970, 1980 और 1990 के दशक तक कॉफी हाउस शहर का सबसे मजबूत और प्रतिष्ठित अड्डा हुआ करता था। लोग कॉफी हाउस पहुंचते और शहर के तमाम लोगों से मुलाकात हो जाती थी। शहर की सारी खबरें वहीं मिल जाती थीं। यह ऐसी जगह है जहां सभी दलों के लोगों का जुटान होता और कोई मतभेद भी नहीं होता था। ऐसे ऐतिहासिक धरोहर का बंद होना अफसोसनाक है। सरकार को इसे बचाने के लिए आगे आना चाहिए।
कॉफी हाउस का बंद होना बहुत दुख की बात
लंबे समय से कॉफी हाउस से जुड़े रहे और इस पर किताब लिखने वाले पत्रकार प्रदीप कपूर कहते हैं कि लखनऊ शहर के लिए बहुत दुख की बात है और उनके लिए भी दुख की बात है, हम पचास साल से जुड़े हैं। तीन माह से काफी हाउस बंद हैं, लोग आते हैं और चले जाते हैं। कॉरिडोर में सन्नाटा है। वह कहते हैं कि अखिलेश यादव की सरकार में कुछ प्रयास हुए। मंत्री शिवपाल यादव भी आए, लेकिन काफी हाउस की दशा सुधर नहीं सकी।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

