आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले का धोलागढ़ गांव आज भी अपनी करीब 500 साल पुरानी लोक परंपरा को सहेजे हुए है। जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में रक्षाबंधन के अगले दिन भुजरिया पर्व पर ‘लहंगी’ खेलने की अनूठी परंपरा निभाई जाती है।
छड़ियों की खनक और लोकगीतों पर थिरकते कदम
लहंगी महोत्सव में ग्रामीण पारंपरिक तरीके से छड़ियों का इस्तेमाल करते हुए लहंगी खेलते हैं। छड़ियों के आपस में टकराने से पैदा होने वाली खनक और उसके बीच ग्रामीणों का सामूहिक नृत्य इस आयोजन को खास बना देता है।
पारंपरिक गीतों के साथ उत्साह बढ़ता जाता है और गांव के लोग पूरे उमंग के साथ उत्सव में शामिल होते हैं। बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक इस परंपरा का हिस्सा बनती है।
शहरों में बसे लोग भी लौटते हैं गांव
धोलागढ़ की इस परंपरा की खास बात यह है कि गांव के कई लोग रोजगार और बेहतर अवसरों के लिए महानगरों तक पहुंच चुके हैं। इसके बावजूद भुजरिया के अवसर पर वे लहंगी महोत्सव में शामिल होने के लिए गांव लौटते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का अवसर भी है। यही वजह है कि तकरीबन पांच सदी से चली आ रही यह परंपरा आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
पूरा गांव बनता है एक परिवार
ग्रामीण बुजुर्गों के अनुसार लहंगी खुशहाली और सामूहिक एकता का प्रतीक है। इस आयोजन में जात-पात और वर्ग का भेद पीछे छूट जाता है और गांव का हर वर्ग उत्सव में भाग लेता है।
महोत्सव के बाद गांव के सरपंच और अन्य ग्रामीणों की ओर से लहंगी खेलने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया जाता है। इससे नई पीढ़ी में भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने का उत्साह पैदा होता है।
सहेजी लोक-संस्कृति की विरासत
बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के बावजूद धोलागढ़ की लहंगी परंपरा का जीवंत रहना इस बात का उदाहरण है कि लोक संस्कृति केवल किताबों या संग्रहालयों में नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी से जीवित रहती है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

