दोस्तों की महफिल हो, ढोलक की थाप पर सजता संगीत का मंच हो या फिर वायरल रील्स का ट्रेंड- “बाजरे दा सिट्टा” के बिना आज हर जश्न अधूरा सा लगता है।
हालांकि, जिस मॉडर्न रैप और बीट्स पर आज पूरी जनरेशन झूम रही है, उसके हर शब्द में पंजाब की संस्कृति की खुशबू बसी है। जी हां, यह सिर्फ एक ट्रेंडिंग गाना नहीं, बल्कि बाजरे की लहराती बालियों, हथेलियों की कड़ी मेहनत और प्यार में रूठने-मनाने की एक बेहद सुरीली दास्तान है। आइए, डिटेल में इस लोकगीत की गहराई को समझते हैं।
बाजरे दा सिट्टा’ का असल मतलब
यह गाना पंजाब के ठेठ देहाती जीवन और वहां की लोक संस्कृति का एक खूबसूरत हिस्सा है। ‘बाजरे दा सिट्टा’ का सीधा-सा मतलब होता है- ‘बाजरे का भुट्टा’ या ‘बाजरे की बाली’। पुराने समय में जब फसल कटती थी, तो महिलाएं हाथों से अनाज को अलग किया करती थीं।
गाने की मशहूर लाइन “बाजरे दा सिट्टा, वे असां तल्ली ते मरोड़या” का असल अर्थ है- ‘मैंने बाजरे की बाली (सिट्टा) को अपनी हथेली (तल्ली) पर रखकर मरोड़ा (ताकि उसमें से दाने निकल आएं)।’
सीधे-सादे बोलों में छिपी हैं गहरी भावनाएं
इस लोकगीत के बोल भले ही बहुत आसान और खेती-किसानी से जुड़े लगते हों, लेकिन इनके पीछे प्यार और मनुहार के जज्बात बहुत मजबूती से पिरोए गए हैं। इस गाने की अगली पंक्ति है:

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

