‘ससुराल की चौखट से मायके को पुकार…’ बेटियों के अनकहे दर्द की कहानी सुनाता है देवभूमि का खुदेड़ लोकगीत
देवभूमि उत्तराखंड में ऊंचे और बर्फीले पहाड़ कितने शांत दिखाई देते हैं, पर इसी मौन में पहाड़ों की बेटियों का दर्द सुनाई देता है। वही दर्द जो संस्कृति में लिपटकर एक सुर बन गया और कहलाया खुदेड़ लोकगीत।
देवभूमि का खुदेड़ लोकगीत
देवभूमि में विवाहित बेटियों द्वारा गाए जाने वाले खुदेड़ लोकगीत में खुदेड़ का मतलब है किसी का बिछड़ जाना या दूर चले जाना। जब बेटी की शादी होती है तो वह अपने मायके से अलग हो जाती है, और इसी पीहर के विरह की पीड़ा से खुदेड़ का जन्म होता है। इस लोकगीत में विरह के साथ प्रेम भी है, तड़प भी और अकेलापन भी क्योंकि वह स्त्री अपना दु:ख उस नए घर में किसी से साझा नहीं कर सकती।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

