ढोलक की तेज थाप पर गूंजता है ओडिशा का ‘दालखाई’, संबलपुर की जनजातियों से जुड़ी है परंपरा
संबलपुर। पश्चिमी ओडिशा की समृद्ध लोक संस्कृति में ‘दालखाई’ गीत और नृत्य की अपनी खास पहचान है। ढोल, निशान, ताशा और मुहुरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप के बीच गाए जाने वाले दालखाई गीत उत्सवों के दौरान माहौल को जीवंत बना देते हैं। संबलपुर क्षेत्र में इस लोक परंपरा का जनजातीय समुदायों से लंबे समय से गहरा संबंध रहा है।
दालखाई को खास तौर पर दशहरा, भाई-जुंतिया और अन्य पारंपरिक अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है। संबलपुर जिला प्रशासन के अनुसार बिंझाल, सौरा और मिर्धा समुदायों की युवतियां पारंपरिक रूप से दालखाई नृत्य प्रस्तुत करती रही हैं। नृत्य के दौरान महिलाएं कतार या अर्धवृत्ताकार समूह में खड़ी होकर गीत गाती हैं और लयबद्ध कदमों के साथ नृत्य करती हैं।
दालखाई का धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। सांस्कृतिक स्रोतों के अनुसार पश्चिमी ओडिशा में दालखाई देवी की आराधना से इस परंपरा का संबंध माना जाता है। भाई-जुंतिया के अवसर पर महिलाएं अपने भाइयों की लंबी उम्र और कल्याण की कामना के लिए व्रत रखती हैं और शाम के समय दालखाई गीत-नृत्य की परंपरा निभाई जाती है।
दालखाई गीतों में गांव-देहात के जीवन, प्रकृति, ऋतुओं, देवी-देवताओं और सामाजिक भावनाओं की झलक मिलती है। इन गीतों की एक खास विशेषता यह भी है कि कई गीत लिखित रूप में संरक्षित नहीं रहे, बल्कि कलाकारों ने उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्मृति और मौखिक परंपरा के जरिए आगे बढ़ाया।
संबलपुर में दालखाई की प्रस्तुति पारंपरिक वाद्य संगीत से जुड़ी होती है। ढोल और निशान जैसे वाद्य यंत्रों की तेज लय नृत्य को गति देती है। पश्चिमी ओडिशा में दालखाई और दुलदुली की परंपराएं एक-दूसरे से भी जुड़ी हुई हैं और स्थानीय कलाकारों ने इन्हें पीढ़ियों से जीवित रखा है।
आज दालखाई केवल एक लोकगीत या नृत्य नहीं, बल्कि पश्चिमी ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान इसकी प्रस्तुति स्थानीय परंपराओं और सामुदायिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनी हुई है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

