सावन की शान और जयपुर के राजघराने की पसंद! 1727 से बन रही इस शाही मिठाई ‘घेवर’ की कहानी कर देगी हैरान

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 इतिहास में देखें तो 300 से 400 साल पहले से घेवर का उल्लेख आया हुआ है। श्रीकृष्ण के भजन से लेकर अधिकांश राजस्थानी लोकगीतों में जब-जब सावन की चर्चा होती है, वहां घेवर जरूर आता है। कभी शाही भोजन का हिस्सा रहा घेवर धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचने लगा।

खाने में जितनी मीठी, मगर बनाने में उतनी ही पेचीदा इस मिठाई के बारे में आइए जानें लक्ष्मी मिष्ठान भंडार, जयपुर के अजय अग्रवाल से। खास बात यह है कि घेवर बनाने के तरीके में आज भी कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। हां, आप इसकी सजावट में या आकार में बदलाव ला सकते हैं, लेकिन कच्चे माल के संयोजन में ज्यादा परिवर्तन का मतलब होगा कि यह अपने स्वाद से भटक गया।

पीढ़ियों पुरानी परंपरा

किसी भी चीज में जब तक उसकी मौलिकता और प्रामाणिकता बनी रहती है, तब तक उसका आकर्षण सदाबहार रहता है। प्रयोगधर्मी नवाचार भले ही तात्कालिक तौर पर लोकप्रिय हो जाएं, लेकिन वे उतनी ही तेजी से अपनी विशिष्टता खो बैठते हैं।

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