इतिहास में देखें तो 300 से 400 साल पहले से घेवर का उल्लेख आया हुआ है। श्रीकृष्ण के भजन से लेकर अधिकांश राजस्थानी लोकगीतों में जब-जब सावन की चर्चा होती है, वहां घेवर जरूर आता है। कभी शाही भोजन का हिस्सा रहा घेवर धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचने लगा।
पीढ़ियों पुरानी परंपरा
किसी भी चीज में जब तक उसकी मौलिकता और प्रामाणिकता बनी रहती है, तब तक उसका आकर्षण सदाबहार रहता है। प्रयोगधर्मी नवाचार भले ही तात्कालिक तौर पर लोकप्रिय हो जाएं, लेकिन वे उतनी ही तेजी से अपनी विशिष्टता खो बैठते हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

