आज से ठीक 61 साल पहले, पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में अशांति फैलाने और वहां विद्रोह भड़काने की गुप्त साजिश रची थी। इसे पाकिस्तान ने नाम दिया था ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’।
लेकिन पाकिस्तान सेना का यह गुप्त अभियान न केवल बुरी तरह से असफल हुआ, बल्कि इसके कारण भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 का बड़ा युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में पाकिस्तान को एक बार फिर भारत ने बुरी तरह धूल चटाई थी।
क्या थी पाकिस्तान की साजिश?
1962 में चीन के साथ हुए युद्ध के बाद पाकिस्तान को लगा कि भारतीय सेना कमजोर स्थिति में है। इसी गलतफहमी के आधार पर पाकिस्तान ने अगस्त 1965 में हजारों हथियारबंद घुसपैठियों को चुपके से सीजफायर लाइन के पार कश्मीर भेजा।
पाकिस्तान का मकसद स्थानीय लोगों को भारत के खिलाफ भड़काना और कश्मीर पर कब्जा जमाना था।
बुरी तरह नाकाम हुई पाकिस्तान की साजिश
पाकिस्तान की यह रणनीति पूरी तरह उल्टी पड़ गई। कश्मीरी जनता ने घुसपैठियों का साथ देने से साफ इनकार कर दिया और तुरंत भारतीय सेना को उनकी मौजूदगी की जानकारी दे दी। भारतीय सेना ने कड़ा जवाब देते हुए अगस्त के आखिर तक हाजी पीर दर्रे जैसे कई महत्वपूर्ण इलाकों का कब्जा जमा लिया
युद्ध का मैदान बना पंजाब और राजस्थान
अपनी नाकामी से बौखलाए पाकिस्तान ने जब जम्मू के अखनूर पर हमला करने के लिए ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम शुरू किया, तो भारत ने 6 सितंबर को लाहौर के पास अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर एक नया मोर्चा खोल दिया। इसके बाद यह लड़ाई पंजाब और राजस्थान तक फैल गई।
पंजाब के खेमकरण क्षेत्र में असल उत्तर की प्रसिद्ध लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के दर्जनों आधुनिक पैटन टैंकों को तबाह कर दिया। उस जगह को बाद में पैटन नगर कहा गया।
वहीं सियालकोट और चाविंडा में दूसरे विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी टैंक लड़ाइयां लड़ी गईं।
वायु सेना का हुआ बड़े पैमाने पर इस्तेमाल
दोनों देशों की वायुसेनाओं ने भी इस युद्ध में अपने लड़ाकू विमानों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। भारतीय वायु सेना (IAF) ने हॉकर हंटर, फॉलैंड नैट, मिस्टेयर IV, वैम्पायर और कैनबरा बॉम्बर जैसे विमान तैनात किए।
जबकि पाकिस्तान वायु सेना (PAF) ने F-86 सेबर, F-104 स्टारफाइटर और B-57 कैनबरा विमानों का इस्तेमाल किया। दोनों वायु सेनाओं ने हवाई सुरक्षा, जमीनी हमले और दुश्मन की गतिविधियों को रोकने के मिशन चलाए, जिनमें सैन्य ठिकानों, सप्लाई रूटों और एयर बेस को निशाना बनाया गया।
सीजफायर और फिर ताशकंद समझौता
अंतरराष्ट्रीय दबाव और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद 22 सितंबर 1964 को दोनों देशों के बीच युद्धविराम लागू हुआ। इसके बाद जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते के तहत दोनों देश अपनी पुरानी सीमाओं पर वापस लौटने के लिए सहमत हुए।
भारत के लिए यह युद्ध एक बड़ी सैन्य सफलता साबित हुआ, क्योंकि भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कश्मीर पर कब्जा करने के इरादों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

