जीवन में नियम-मर्यादाओं पर दृढ़ रहते हुए समझदारी से चलें : राजयोगी राजू
विंध्यनगर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के तपोवन परिसर, विंध्यनगर में योग-तपस्या भट्टी का विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में गहन योग साधना, आत्म निरीक्षण, सकारात्मक चिंतन एवं जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को धारण करने पर विशेष जोर दिया गया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी शैलजा दीदी ने कहा कि गहन योग साधना हमारे पुरुषार्थ को आगे बढ़ाने का श्रेष्ठ माध्यम है। इससे स्वचिंतन एवं आत्म निरीक्षण का अवसर मिलता है। स्वचिंतन करते-करते हम शुभचिंतक बन सकते हैं और प्रत्येक प्राणी के प्रति मन में शुभ भावना एवं शुभकामना रख सकते हैं। उन्होंने कहा कि दूसरों की कमियां हमें शीघ्र दिखाई देती हैं, लेकिन अपनी कमियों को हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। किसी से गलती हो जाए तो उसे शिक्षा देने के बजाय क्षमा करना सीखना चाहिए। प्रत्येक आत्मा के प्रति श्रेष्ठ भावना रखने से स्वयं के साथ दूसरों में भी सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाली परिस्थितियों के साथ स्वयं को एडजस्ट करना सीखना चाहिए। ‘मैं आत्मा हूं, देह से न्यारी हूं’ का शुद्ध संकल्प आत्मा को शक्तिशाली एवं निर्भय बनाता है। स्वयं को देह को चलाने वाली चैतन्य शक्ति समझकर कर्म करने से हमारे कर्म श्रेष्ठ बनते हैं। ज्ञान हमें समझदार बनाता है, इसलिए जीवन में नियम-मर्यादाओं पर दृढ़ रहते हुए समझदारी के साथ चलने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि संसार में अनेक मत-मतांतर हैं, इसलिए मन को व्यर्थ की उलझनों में नहीं डालना चाहिए। मन की शक्ति को व्यर्थ गंवाने के बजाय परमात्मा द्वारा दिए गए ज्ञान को जीवन में धारण कर परिस्थितियों का सामना ज्ञान और योग की शक्ति से करना चाहिए।

माउंट आबू से पधारे ब्रह्माकुमार राजू भाई ने कहा कि वर्तमान समय में मन की शक्तियों को बढ़ाने और अपनी मंसा शक्ति को शक्तिशाली बनाने की विशेष आवश्यकता है। मन की कमजोरी अनेक समस्याओं को जन्म देती है और कमजोर मन के कारण गलत निर्णय भी हो सकते हैं। जिन आत्माओं को परमात्मा पर निश्चय है, उन्हें परमात्मा की मदद अवश्य मिलती है। उन्होंने कहा कि हमारे अंदर इतनी शक्ति हो कि समय पर बुद्धि सही निर्णय ले सके।
राजू भाई ने कहा कि ब्रह्माकुमारीज के माध्यम से 14 लाख से अधिक लोगों ने ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त किया है और आध्यात्मिक जागृति के माध्यम से विश्व में परमात्मा के संदेश को पहुंचाने का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बाबा ने सिखाया है कि ‘क्या, क्यों, कब, कहां और कैसे’ जैसी व्यर्थ की उलझनों में नहीं फंसना चाहिए। किसी भी प्रकार का बंधन आत्मा को उड़ती कला का अनुभव नहीं करने देता। यदि कोई आत्मा आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नति नहीं कर पा रही है तो उसे अपनी संगति और विचारों का आत्म निरीक्षण करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि ज्ञानी आत्मा सोच-समझकर कर्म करती है, जबकि अज्ञानी आत्मा कर्म करने के बाद पश्चाताप करती है। स्वास्थ्य और संबंधों को बेहतर बनाए रखने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है। ब्रह्माकुमारी संस्थान को आध्यात्मिक दृष्टि देने वाला ‘दुनिया का सबसे बड़ा आंखों का हॉस्पिटल’ बताते हुए उन्होंने कहा कि परमात्मा का ज्ञान हमारी दृष्टि और देखने के नजरिए को सकारात्मक बनाता है। पवित्रता ब्रह्माकुमारी संस्थान की विशेष पहचान है।
राजू भाई ने कहा कि जो आत्मा फरिश्ता बनना चाहती है, उसे अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करने की विधि में परिवर्तन करना होगा। आलस्य ज्ञानी और योगी आत्मा का बड़ा शत्रु है। इसलिए स्वयं को कर्मणा सेवा में व्यस्त रखना चाहिए। परमात्मा से वरदान प्राप्त करने के साथ-साथ अपनी शक्तियों और गुणों का दूसरों के प्रति दान भी करना चाहिए। मनसा से शक्तियों का सहयोग, वाचा से ज्ञान-रूपी रत्नों का सहयोग और कर्मणा से गुणों का सहयोग देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनन-चिंतन के साथ ज्ञान को जीवन में धारण करना ही वास्तविक सफलता है। “फरिश्ता माना जिसका किसी से रिश्ता नहीं, फरिश्ता माना जिसका कोई अलग रास्ता नहीं।” इस भाव को जीवन में धारण कर आत्मिक उन्नति की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

