एक दौर था जब लखीसराय जिले के ग्रामीण इलाकों की पगडंडियाँ और गलियाँ गर्मियों की आहट के साथ ही पके आमों की सोंधी खुशबू से महक उठती थीं। सूर्यगढ़ा का प्रसिद्ध ‘बीजू आम’, बड़हिया के विशाल पारंपरिक बगीचे और चानन क्षेत्र के घने आम के बाग कभी लखीसराय जिले की सांस्कृतिक और कृषि पहचान माने जाते थे।
तेजी से बदला परिदृश्य
लेकिन बदलते आधुनिक दौर में अंधाधुंध शहरीकरण, भू-माफियाओं के बढ़ते प्रभाव, जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल और खेती के नए तौर-तरीकों ने इस समृद्ध विरासत पर ग्रहण लगा दिया है। जहाँ कभी मीलों दूर तक आम के लदे हुए घने और ठंडे बाग दिखाई देते थे, आज वहाँ ऊँचे पक्के मकान, चमचमाती सड़कें और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स नजर आते हैं।
बाजारों में घटी स्थानीय मिठास
इस कंक्रीट के बदलाव का नतीजा यह हुआ है कि लखीसराय के स्थानीय बाजार भले ही पहले से कई गुना बड़े हो गए हों, लेकिन यहाँ के पारंपरिक आम की मिठास लगातार सिमटती जा रही है। जिला उद्यान विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान समय में पूरे लखीसराय जिले में लगभग 900 हेक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्र में ही आम की खेती बची रह गई है।
5 हजार टन वार्षिक उत्पादन
मौजूदा रकबे से जिले में हर साल लगभग 5,173 मीट्रिक टन आम का कुल उत्पादन दर्ज किया जाता है, जो स्थानीय बाजारों की तात्कालिक जरूरतों को किसी तरह पूरा कर रहा है। बागों के उजड़ने का सबसे दर्दनाक और बड़ा असर सूर्यगढ़ा प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिला है, जहाँ कभी बीजू आम के पेड़ बहुतायत में पाए जाते थे।
‘बीजू आम का गांव’ हुआ बेनूर
सूर्यगढ़ा के सलेमपुर, भवानीपुर और आसपास की पंचायतों के बीजू आम पूरे बिहार में विख्यात थे, जिस वजह से इस इलाके को बरसों तक ‘बीजू आम का गांव’ कहा जाता था। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने और फलदार पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और नई पीढ़ी का पारंपरिक बागवानी से विमुख होना इस भारी गिरावट का सबसे मुख्य कारण है।
कम समय की फसलों पर जोर
आम के एक पौधे को पूर्ण वृक्ष बनकर फल देने में कई सालों का लंबा समय लगता है, जबकि आजकल के किसान कम समय में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों को तरजीह दे रहे हैं। हालांकि इस घटते रकबे को थामने के लिए जिला उद्यान विभाग अब किसानों को उन्नत और हाइब्रिड किस्मों की पौध उपलब्ध कराकर नए आधुनिक बगीचे लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
इन किस्मों का हो रहा रोपण
जिले के बड़हिया और चानन प्रखंडों में आम्रपाली, मालदा, लंगड़ा, दशहरी और मालदा-जर्दालु जैसी वाणिज्यिक और मांग वाली किस्मों के नए पौधरोपण पर विशेष जोर दिया जा रहा है। राष्ट्रीय आम दिवस के अवसर पर यह गंभीर सवाल हर लखीसरायवासी के जेहन में कौंध रहा है कि क्या आने वाली भावी पीढ़ी अपने पूर्वजों की इस गौरवशाली विरासत को देख पाएगी?
संरक्षण की सख्त जरूरत
यदि समय रहते पुराने ऐतिहासिक बगीचों के संरक्षण और नए पैमाने पर पौधरोपण की ठोस योजना नहीं बनी, तो लखीसराय की यह मिठास सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगी।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

