हरियाणा कांग्रेस में एकजुटता का दिखावा, मगर सुरों में तालमेल नहीं; नेताओं के बीच खींचतान अभी भी बरकरार

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हरियाणा कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी संजय सतीशचंद्र दत्त का पांच दिवसीय दौरा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश लेकर आया। लंबे समय बाद कांग्रेस के लगभग सभी बड़े चेहरे भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कुमारी सैलजा, रणदीप सिंह सुरजेवाला, चौधरी बीरेंद्र सिंह, कैप्टन अजय यादव, डॉ. अशोक तंवर, चौधरी उदयभान, बृजेंद्र सिंह और दीपेंद्र सिंह हुड्डा एक मंच पर दिखाई दिए। यह तस्वीर कार्यकर्ताओं के लिए सकारात्मक थी, लेकिन मंच से दिए गए नेताओं के वक्तव्यों ने स्पष्ट कर दिया कि संगठन के भीतर मतभेद केवल दबे हैं, समाप्त नहीं हुए हैं।

हरियाणा कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसका आंतरिक शक्ति संतुलन है। पिछले कई वर्षों से पार्टी अलग-अलग शक्ति केंद्रों में बंटी हुई है। विधानसभा चुनाव में सत्ता के करीब पहुंचने के बावजूद कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी। इसके पीछे टिकट वितरण से लेकर नेतृत्व और चुनावी रणनीति तक कई विवाद प्रमुख कारण रहे। ऐसे में नए प्रभारी का सबसे बड़ा दायित्व नेताओं के बीच भरोसा बहाल करना है।

पहले ही दिन मंच से हुई टिप्पणियां इस बात का संकेत थीं कि हर नेता अपनी राजनीतिक हैसियत और भूमिका को लेकर सजग है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा का रणदीप सुरजेवाला से ‘साथ देने’ का आग्रह और सुरजेवाला का ’20 साल साथ दिया, अब आप हमारा साथ दीजिए’ वाला जवाब केवल हल्का-फुल्का संवाद नहीं था। यह हरियाणा कांग्रेस में नेतृत्व और निर्णय लेने के अधिकार को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा की सार्वजनिक झलक थी।

इसी तरह कुमारी सैलजा का यह कहना कि नेताओं को अपने बजाय ‘कांग्रेस जिंदाबाद’ के नारे लगवाने चाहिए, संगठन के भीतर व्यक्तिवाद पर सीधी टिप्पणी माना जा सकता है। उनका यह प्रहार हुड्डा पर नजर आ रहा है। विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट वितरण को लेकर सैलजा की नाराजगी पहले भी सामने आ चुकी है। वहीं, दीपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा वोट प्रतिशत बढ़ने को उपलब्धि बताने पर सुरजेवाला का यह कहना कि सरकार सीटों से बनती है, वोट प्रतिशत से नहीं, चुनावी रणनीति की अलग-अलग सोच को सामने लाता है।

इन घटनाओं का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि कांग्रेस के भीतर अब नेतृत्व की लड़ाई खुलकर टकराव की बजाय संकेतों और प्रतीकों के जरिए लड़ी जा रही है। यह तरीका भले संयमित दिखाई दे, लेकिन यदि इसे समय रहते संगठनात्मक संवाद से नहीं सुलझाया गया तो चुनाव के समय यही मतभेद फिर नुकसान पहुंचा सकते हैं।

कांग्रेस प्रभारी ने समझाया अपने हरियाणा दौरे का मूल मंत्र

कांग्रेस प्रभारी संजय दत्त ने अपने पहले ही संबोधन में स्पष्ट संकेत दिया कि विचारों की भिन्नता स्वाभाविक है, लेकिन पार्टी हित सर्वोपरि होना चाहिए। यही उनके दौरे का मूल उद्देश्य भी माना जा रहा है। यदि वह सभी प्रमुख नेताओं को साझा रणनीति, सामूहिक नेतृत्व और संगठनात्मक अनुशासन के सूत्र में बांधने में सफल होते हैं तो कांग्रेस आगामी चुनावों में भाजपा के सामने मजबूत चुनौती पेश कर सकती है।

बनी एकजुटता की तस्वीर, मगर नहीं भरे एकमत होने के रंग

कुल मिलाकर, कांग्रेस नेताओं की एक दूसरे पर छींटाकशी का घटनाक्रम यह बताता है कि हरियाणा कांग्रेस में एकजुटता की तस्वीर तो बन गई है, लेकिन एकमत की राजनीति अभी बननी बाकी है।

कांग्रेस पार्टी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि उसका मुख्यमंत्री चेहरा कौन होगा, बल्कि यह है कि क्या उसके सभी बड़े नेता एक-दूसरे की राजनीतिक स्वीकार्यता के साथ मिलकर चुनाव लड़ने को तैयार हैं।

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