छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विवाह को अवैध या अप्रमाणित बताकर पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने बिलासपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें पति आकाशदीप मनहर को अपनी पत्नी मंजू मनहर को दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि वर्तमान महंगाई और दैनिक जीवनयापन की बढ़ती लागत को देखते हुए यह राशि अधिक नहीं है।
आकाशदीप मनहर ने फैमिली कोर्ट के 23 फरवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसने दावा किया था कि उसका और मंजू का वैध विवाह नहीं हुआ। उसने कहा कि आवश्यक धार्मिक रीति-रिवाज पूरे नहीं हुए और विवाह के समर्थन में कोई वैधानिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
दूसरी ओर, मंजू ने कहा कि दोनों ने मंदिर में विवाह किया था और पति ने उसे कुछ समय तक पत्नी के रूप में रखा, लेकिन बाद में छोड़ दिया।
फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के बयान और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद महिला को भरण-पोषण पाने की हकदार माना। हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन किया है और दो हजार रुपये की राशि को अधिक नहीं माना।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

