रामलला के प्रति विपक्ष की बदलती राजनीति आस्था या चुनावी दबाव का परिणाम

किसी भी राष्ट्र या समाज की इससे बड़ी त्रासदी कुछ और नहीं हो सकती, जब उसकी सांस्कृतिक चेतना को राजनीतिक निहितार्थों के तहत पारिभाषित किया जाने लगे। दुर्भाग्य से बीते दशकों में देश में ऐसा ही कुछ देखने को मिला। भगवान राम भारत की सामूहिक श्रद्धा का केंद्र हैं, सभी के हृदय में हैं लेकिन आजादी के बाद की राजनीति ने एक ऐसी वैचारिक परिपाटी गढ़ी, जिसमें बहुसंख्यक आस्था को संदेह की नजर से देखना ही प्रगतिशीलता और सेक्युलरिज्म का प्रमाण बन गया। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इस वैचारिक ढांचे की सबसे मुखर उपज हैं और जब इन दोनों दलों के नेता रामलला के प्रति छद्म आस्था का आवरण ओढ़ने की कोशिश करते हैं तो न सिर्फ उनका वैचारिक दिवालियापन उजागर होता है, बल्कि उनका दोहरा चरित्र भी सामने आ जाता है।

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के वैचारिक चरित्र को समझने के लिए तथ्यों की लंबी फेहरिस्त जरूरी नहीं, बस कुछ घटनाएं ही काफी हैं। सबसे पहले समाजवादी पार्टी की बात करते हैं, जिसके इतिहास में 1990 में कारसेवकों पर गोलियां चलवाने और कोठारी बंधुओं की मौत का कलंक दर्ज है। इससे पहले जब भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली और कारसेवक अयोध्या पहुंचने लगे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का वह दंभ कि ‘अयोध्या में कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता’ भला कौन भूला होगा। हजारों कारसेवकों की गिरफ्तारी, अस्थायी जेलें यह भी सपा के इतिहास का हिस्सा हैं। समाजवादी पार्टी का समाजवाद कभी सामाजिक न्याय की जमीन पर खड़ा वैचारिक आंदोलन रहा होगा, लेकिन अयोध्या के मसले पर उसने जिस रास्ते को चुना, वह एक विशेष वोट बैंक के तुष्टिकरण के लिए ही था और यह मुलायम सिंह यादव के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव के कार्यकाल में भी लगातार देखने को मिला।बहुसंख्यक आस्था के विरुद्ध खड़े होकर एक समुदाय विशेष को खुश करने की यह रणनीति भारतीय राजनीति के सबसे कुत्सित प्रयोगों में गिनी जाती है। इसी रणनीति के तहत 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया तो सपा की प्रतिक्रिया ठंडी और औपचारिक थी। जिस दल की वैचारिक बुनियाद ही हिंदू आस्था के प्रति संदेह पर टिकी हो, अचानक ही उसमें रामभक्ति का प्रकटीकरण विश्वसनीय कैसे हो सकता है। सपा की वैचारिक विरासत का सबसे ताजा उदाहरण अखिलेश यादव के हालिया बयानों में देखा जा सकता है। जून 2026 में जब अयोध्या मंदिर के चढ़ावे में हेराफेरी का मामला सामने आया, तो सपा प्रमुख ने पूरे तथ्य सामने आने से पहले ही सरकार को निशाने पर लेना शुरू कर दिया। उनकी टिप्पणियां अपने आप में ही यह बताती हैं कि अखिलेश के लिए अयोध्या आज भी आस्था का विषय कम, राजनीति का मैदान ज्यादा है। आस्था का विषय होता तो वह भगवान रामलला के दर्शन को भी जरूर ही जाते। उनका यह कहना कि वह इटावा में अपने केदारेश्वरधाम शिव मंदिर का निर्माण पूरा होने के बाद ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम के दर्शन के लिए जाएंगे, यह दर्शाता है कि उनके लिए रामलला के प्रति आस्था अपने संसदीय क्षेत्र की राजनीतिक परियोजना पूरी होने की शर्त पर निर्भर है। इसमें भी वोट की राजनीति ही दिखाई देती है।

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