सिंगरौली। नगर पालिका निगम सिंगरौली में विद्युत उपयंत्री के पद पर कार्यरत गोस्वामी नामक अधिकारी एक बार फिर गंभीर आरोपों के चलते चर्चा में हैं। आरोप है कि समय-समय पर उनके खिलाफ कई शिकायतें और अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे, लेकिन हर बार मामला कथित रूप से प्रभाव और ‘मैनेजमेंट’ के दम पर दबा दिया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित अधिकारी का पक्ष भी सामने आना बाकी है।

सूत्रों के अनुसार गोस्वामी के विरुद्ध हुए शिकायत के अनुसार गोस्वामी की प्रारंभिक नियुक्ति वर्ष 2002 में समयपाल के पद पर हुई थी। उनके खिलाफ हुए लिखित शिकायत में ये आरोप गया था कि उस समय समयपाल पद पर सीधी भर्ती के लिए शासन द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यता हायर सेकेंडरी गणित विषय के साथ उत्तीर्ण होना अनिवार्य थी। लेकिन दावा किया जा रहा है कि गोस्वामी उक्त योग्यता पूरी नहीं करते थे। यदि यह दावा सही पाया जाता है, तो उनकी प्रारंभिक नियुक्ति ही नियमों के विपरीत मानी जा सकती है।

तत्कालीन आयुक्त की जांच रिपोर्ट पर भी उठे सवाल
सूत्रों का कहना है कि गोस्वामी की नियुक्ति और अन्य आरोपों की जांच की जिम्मेदारी तत्कालीन नगर निगम आयुक्त दया किशन शर्मा के जिम्मे पड़ी। आरोप है कि जांच के दौरान वास्तविक तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए शासन को उनके पक्ष में रिपोर्ट भेजी गई। शिकायत में यह भी दावा किया जा रहा है कि इस पूरे प्रकरण में कथित रूप से व्यक्तिगत लाभ लेकर गोस्वामी को राहत पहुंचाई गई। हालांकि इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

आयुक्त की मृत्यु के बाद भेजी गई रिपोर्ट पर भी सवाल
मामले का दूसरा पहलू और भी गंभीर बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार तत्कालीन नगर निगम आयुक्त आर.पी. सिंह के आकस्मिक निधन के बाद जिला कलेक्टर द्वारा उसके दूसरे दिन दिनांक 16.9.2022 की सुबह जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) को नगर निगम आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया था।
आरोप है कि अतिरिक्त प्रभार मिलने के दिनांक 16.9.2022 की शाम के समय नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वयं को आयुक्त की हैसियत में दर्शाते हुए गोस्वामी के पक्ष में एक प्रतिवेदन तैयार कर शासन को भेज दिया। यदि यह तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह सवाल खड़ा होता है कि जब उसी दिनांक 16.9.2022 की सुबह नए प्रभारी आयुक्त की नियुक्ति हो चुकी थी, तब किसी अन्य अधिकारी ने किस अधिकार से स्वयं को आयुक्त मानते हुए शासन को रिपोर्ट भेजी।
गोपनीय दस्तावेज होने का दावा
द टकसाल न्यूज़ के पास इस पूरे मामले से जुड़े शिकायत के कुछ ऐसे गोपनीय दस्तावेज सामने आए हैं। जिसके आधार पर शिकायतकर्ता ने यह आरोप लगाया कि शासन को तथ्यों के विपरीत जानकारी भेजी गई और इसी के आधार पर आगे चलकर संबंधित अधिकारी को पदोन्नति का लाभ भी मिलता रहा। हालांकि इस मामले में संबंधित अधिकारी का भी हमने पक्ष जानने का प्रयास किया मगर उन्होंने व्यस्त होने का दावा करते हुए अपना पक्ष नहीं रखा।
उठ रहे हैं कई बड़े सवाल
- क्या समयपाल पद पर नियुक्ति शासन द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप हुई थी?
- यदि नहीं, तो नियुक्ति किस आधार पर की गई?
- जांच रिपोर्ट तैयार करते समय क्या वास्तविक तथ्यों को छिपाया गया?
- आयुक्त का प्रभार दूसरे अधिकारी को मिलने के बावजूद किस अधिकार से प्रतिवेदन भेजा गया?
- क्या शासन को गलत जानकारी देकर पदोन्नति प्राप्त की गई?
- यदि आरोप सही हैं, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
निष्पक्ष जांच की मांग
मामले में सामने आए आरोपों को देखते हुए स्थानीय स्तर पर निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग उठ रही है। यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह केवल एक अधिकारी का मामला नहीं बल्कि नगर निगम की नियुक्ति प्रक्रिया, जांच प्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।
अगले के एपिसोड में महापौर का फर्जी लेटर से FIR तक…और फिर… आगे…?


