हिंदी के साथ-साथ हालीवुड में भी काम कर रहे अभिनेता अली फजल हालिया प्रदर्शित वेब सीरीज राख में अपनी लोकप्रिय गुड्डू भैया वाली छवि के बिल्कुल अलग एक पुलिस अधिकारी जेपी की भूमिका में नजर आएं। अभिनय के साथ-साथ अली ने साल 2021 में अपनी पत्नी और अभिनेत्री रिचा चड्ढा के साथ अपना प्रोडक्शन हाउस भी शुरू किया था। अली से अभिनय को लेकर उनकी प्राथमिकताओं, हालीवुड और भारतीय सिनेमा के बीच संतुलन समेत कई विषयों पर बातचीत :
-जेपी की भूमिका मिर्जापुर के गुड्डू भैया से बिल्कुल अलग है। क्या अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयारी की अलग प्रक्रिया होती है?
इस शो की स्क्रिप्ट पर बहुत काम हुआ था। मैं इसके लिए निर्देशक और निर्माताओं के साथ बैठा था, सारे सीन को परखा। मैंने यह समझने की कोशिश की कि इस वर्दी के पीछे इंसान कैसा है? इस वर्दी के पीछे उसे किन-किन चीजों से जूझना पड़ता है। हर पात्र की तैयारी की अलग प्रक्रिया होती है, जो कि स्क्रिप्ट और उस प्रोजेक्ट के निर्देशक पर बहुत निर्भर करता है। राख 1978 की कहानी है, जिसके लिए मुझे रिसर्च थोड़ी ज्यादा करना पड़ी कि उस वक्त की लिखाई-पढ़ाई कैसे होती थी, लोगों का रहन-सहन और लहजा कैसे होता था।
जिसमें मैं एक आदमी की कहानी सुना सकूं। एक आम आदमी जो अपने दिमाग और जेहन में न जाने कितनी जद्दोजहद से जूझ रहा होता है। हमारी जनता उसी को पकड़ती है, जिससे वह स्वयं को जोड़ पाते हैं। मुझे वो कहानियां पसंद आती हैं, जहां हम किसी के दिमाग के अंदर घुसकर उस पात्र का हाल जान सकूं।
-क्या जीवन में कभी किसी घटना या प्रोजेक्ट को लेकर अफसोस हुआ कि काश वो न हुआ होता?
(हंसते हुए) मेरी जिंदगी में तो ऐसी बहुत सी चीजें हुई हैं। अगर काश, शब्द आ रहा है, तो इसका मतलब ही है कि पहले गलत निर्णय ले लिया है। जो चीजें नहीं चलती हैं, वो आपके साथ रह जाती हैं। जो चलती हैं, वो तो समय के साथ चली जाती हैं। ऐसी कई चीजें मेरे साथ हुई हैं, लेकिन कभी किसी का पछतावा नहीं रहा। मेरे लिए कहानी और कहानी सुनाने वाला दोनों बहुत जरूरी पहलू होते हैं। मैंने दुनिया के कुछ जाने-माने लोगों के साथ कुछ अंग्रेजी फिल्में की है, शायद वहां से मुझे यह तजुर्बा मिला है।
-हालीवुड और हिंदी, दोनों सिनेमा की कार्यशैली बिल्कुल अलग है। क्या कभी दोनों के बीच संतुलन बनाने को लेकर झुंझलाहट नहीं होती?
इसमें मैं थोड़ा जूझ रहा हूं। एक फिल्म में प्रतिबद्धताओं के कारण पिछले साल मुझे हालीवुड का एक बहुत बड़ा शो छोड़ना पड़ा था। कभी-कभी ख्याल आता है कि सब कुछ छोड़ कर वहीं (हालीवुड) चला जाऊं, लेकिन मेरा मन और दिल भारतीय सिनेमा में ही अटका रहता है। यहां बहुत सी कहानियां हैं। मैं ठहरा देसी आदमी, मुझे तो यहां की बहुत सी कहानियां सुनानी है।
-बतौर निर्माता आपने रिचा के साथ आठ फिल्मों की घोषणा की थी। उन पर अब तक कितना काम आगे बढ़ा है?
हम दोनों ही कलाकार हैं, इसी कारण अभिनय के बीच में हमारा प्रोडक्शन का काम थोड़ा मात खा जाता है, लेकिन हमारा काम चल रहा है। हम दोनों स्वतंत्र निर्माता हैं, हमारे पास निवेशकों की कोई लाइन नहीं लगी रहती है। फिलहाल हम दो फिल्में और एक शो बना रहे हैं। उम्मीद है कि लोग हमसे जुड़े और इन प्रोजेक्ट्स पर काम और आगे बढ़े।
-बतौर निर्माता सिर्फ विषय प्रधान प्रोजेक्ट ही बनाएंगे या कमर्शियल मसाला प्रोजेक्ट्स की भी कुछ योजना है?
हमने कोई एक जानर तो नहीं चुना है, लेकिन अब हम देख रहे हैं कि अब विषय प्रधान और कमर्शियल मसाला फिल्मों को बांटने वाली रेखा धुंधली हो रही है। अब आस्कर समेत बड़े वैश्विक मंचों पर जो भी कमर्शियल फिल्में जा रही हैं, उनमें ज्यादातर फिल्में फिल्म फेस्टिवल्स से आ रही हैं। वहीं हमारे यहां सोच है कि अगर फिल्म फेस्टिवल में गई तो वह फेस्टिवल की या छोटी फिल्म है। कमर्शियल फिल्में भी अच्छी, विश्वस्तरी और विषय प्रधान फिल्में हो सकती हैं।
-क्या मिर्जापुर : द मूवी में भी वेब सीरीज मिर्जापुर की तरह ही गुड्डू भैया दिखेंगे या अंदाज कुछ अलग होगा?
हम इंडस्ट्री में एक नया प्रयोग कर रहे हैं कि किसी भारतीय वेब सीरीज पर फिल्म बनाई जा रही है। फिलहाल इस फिल्म की एडिटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन का काम चल रहा है। ये तो जनता की फिल्म है। फिल्म में भी वेब सीरीज के पहले सीजन की तरह ओरिजिनल कलाकार और लुक हैं। लोगों को वैसा ही मजा आएगा। मैंने भी गुड्डू भैया के लिए पहले सीजन की तरह ही तैयारी की थी।


