‘न जाने किस गली में…’ जब पीलीभीत में बशीर बद्र की शायरी पर झूमा था मजमा, यादें आज भी हैं ताजा

 अंतरराष्ट्रीय शायर बशीर बद्र के शेर को पसंद करने वाले देश दुनिया के साथ जिले में भी हैं। यही वजह रही कि वह दो बार यहां पर शायरी पढ़ने के लिए आए। शायरी के मंच पर जब उन्होंने पढ़ा तो सामने बैठे लोग वाह-वाह करते गए। उनका शेर… ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’ लोगों के जेहन में बार-बार आता रहा।

वह शहर में दो बार शायरी पढ़ने के लिए आए थे। शहर ने उनकी मेजबानी भी खूब की थी। शायर बशीर बद्र ने राम स्वरूप पार्क में 1988 में मुशायरा पढ़ा था, जिसकी यादें लोगों के जेहन में बसी हुई हैं।

इसके बाद वह 1993 में वाटर वर्क्स में आयोजित मुशायरे में आए थे, जहां पर किसी बात को लेकर दूसरे शायर से विवाद हो गया था। इसके बाद वह बिना पढ़े ही मंच छोड़कर चले गए थे। बताते हैं कि वह शहर में डा. जकाउद्दीन शायां के घर वह रुके थे, लेकिन अब उनका भी इंतकाल हो चुका है। डा. जकाउद्दीन के बेटे असद जका ने उनकी यादों को साझा किया।

शायर बशीर बद्र दो बार पीलीभीत में शायरी पढ़ने के लिए आए थे। उनको सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे। वह दो बार शायरी पढ़ने के लिए आ चुके हैं। – इरफान सागर, शायर

शायर बशीर बद्र मेरे पिता डा. जकाउद्दीन शायां के बड़े अच्छे दोस्त थे। वह मेरे घर पर ही रुके थे। मेरे पिता भी उनके घर पर जाते थे। वह अक्सर उनके किस्से सुनाया करते थे। – असद जका

बशीर बद्र के कुछ पसंदीदा शेर

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूं कोई बेवफा नहीं होता

मुसाफर हैं हम भी मुसाफिर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी

जिंदगी तूने मुझे कब्र से कम दी है जमीं
पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो

यहां लिबास की कीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला

अजीब शख्स है नाराज हो के हंसता है
मैं चाहता हूं खफा हो तो वो खफा ही लगे

आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफिर ने समुंदर नहीं देखा

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