‘वह इंडिया आउट कैंपेन चला रहा था’, भारत-मालदीव के उदाहरण के साथ अमेरिका में थरूर की डिप्लोमेसी मास्टरक्लास

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 कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने विदेशी कूटनीति में भरोसा कायम करने का भारत का एक बेहतरीन उदाहरण शेयर किया है। अमेरिका के फ्लेचर स्कूल में चर्चा के दौरान उन्होंने रेखांकित किया कि मालदीव में भारत विरोधी अभियान चलने के बावजूद नई दिल्ली संकट के समय साथ खड़ी रही। थरूर ने कहा कि भरोसा बयानों से नहीं, बल्कि आपके द्वारा किए गए कार्यों से बनता है।

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइजू का नाम लिए बिना संदर्भ देते हुए थरूर ने कहा कि मालदीव के पिछले चुनाव में, जो व्यक्ति राष्ट्रपति बना, उसने अपना पूरा चुनाव अभियान इंडिया आउट के नारे पर चलाया था। जीतने के तुरंत बाद, उन्होंने भारतीय कंपनियों के कई कॉन्ट्रैक्ट भी रद कर दिए।

उन्होंने आगे की घटना याद करते हुए बताया कि उनके राष्ट्रपति बनने के कुछ ही महीनों बाद, वहां के सबसे बड़े द्वीप और राजधानी शहर में पीने के पानी का सबसे बड़ा, और मेरे ख्याल से एकमात्र डिसेलिनेशन प्लांट खराब हो गया। अचानक मालदीव के पास पानी नहीं बचा। वहां के लोगों के पास पीने के लिए पानी नहीं था।

संकट में भारत ने निभाया अच्छे पड़ोसी का फर्ज

ऐसी भारत विरोधी बयानबाजी और अभियानों के बावजूद, नई दिल्ली ने एक अच्छे पड़ोसी की भूमिका निभाई। शशि थरूर ने बताया कि मालदीव को संकट से उबारने के लिए भारत ने विमानों के जरिए लाखों लीटर पीने का पानी वहां भेजा।

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारत ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें बचाने के लिए विमानों से लाखों लीटर बोतलबंद पीने का पानी भेजा। भारत ने इसके बदले कुछ नहीं किया, न ही कोई मांग रखी।

यह महज पड़ोस में रहने वाले एक पड़ोसी की तरफ से सद्भावना की एक पहल थी। आप कल्पना कर सकते हैं कि इस घटना के बाद मालदीव में इंडिया आउट के तेवर काफी हद तक ठंडे पड़ गए। भरोसा हमेशा काम करने से बनता है।

फ्लेचर स्कूल में थरूर को मिला सर्वोच्च सम्मान

कूटनीति का यह व्यावहारिक पाठ फ्लेचर फोरम ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स में सामने आया, जिसका आयोजन मैसाचुसेट्स की टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के फ्लेचर स्कूल ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी द्वारा किया गया था।

संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक के रूप में सेवा दे चुके पूर्व राजनयिक शशि थरूर खुद फ्लेचर स्कूल के छात्र रह चुके हैं। अपनी इस यात्रा के दौरान उन्हें विशिष्ट सेवा के लिए स्कूल के सर्वोच्च सम्मान डीन्स मेडल से सम्मानित किया गया।

इस आयोजन की तस्वीरें अपने सोशल मीडिया हैंडल पर साझा करते हुए थरूर ने लिखा कि मैं पहली बार यहां 1975 में भारत से आए एक 19 साल के युवक के रूप में पहुंचा था, जो जिज्ञासु था और इस बात को लेकर अनिश्चित था कि आगे क्या होने वाला है।

फ्लेचर ने दुनिया और उसमें मेरी जगह के बारे में सोचने के मेरे नजरिए को आकार दिया। पचास साल बाद, साल 2026 के बैच के सामने स्कूल के सर्वोच्च सम्मान, विशिष्ट सेवा के लिए डीन्स मेडल के प्राप्तकर्ता के रूप में खड़ा होना मेरे लिए बेहद व्यक्तिगत और भावुक क्षण था।

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