Dehradun Hospital Fire: आग को मिलती ‘ऑक्सीजन’ तो और भयानक होता मंजर, दून के अस्पतालों पर उठे सवाल

 पैनेसिया अस्पताल अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शहर के अस्पताल वास्तव में आपदा से निपटने के लिए तैयार हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस हादसे में सबसे बड़ी राहत यह रही कि आग आईसीयू के आक्सीजन सप्लाई सिस्टम तक नहीं पहुंची। यदि ऐसा होता, तो चंद मिनटों में पूरा वार्ड आग की चपेट में आ सकता था और तबाही कहीं अधिक भयावह होती।

कहीं अधिक भयावह होती तबाही

अस्पतालों के आईसीयू , आपरेशन थिएटर और हाई-डिपेंडेंसी यूनिट ऐसे क्षेत्र होते हैं, जहां लगातार आक्सीजन सप्लाई चलती रहती है। यही वजह है कि आग लगने की स्थिति में ये वार्ड सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि आक्सीजन स्वयं ज्वलनशील ईंधन नहीं है, लेकिन यह दहन प्रक्रिया को कई गुना तेज कर देती है।

सामान्य परिस्थितियों में सीमित रहने वाली आग, आक्सीजन-समृद्ध वातावरण में कुछ ही सेकंड में विकराल रूप ले सकती है। अस्पतालों में पाइपलाइन नेटवर्क, आक्सीजन सिलेंडर और लिक्विड आक्सीजन सिस्टम लगातार सक्रिय रहते हैं। ऐसे में मामूली शार्ट सर्किट, स्पार्क, ओवरहीटिंग उपकरण या ज्वलनशील सामग्री भी बड़े विस्फोटक हालात पैदा कर सकती है। यदि कहीं आक्सीजन लीकेज हो जाए, तो आग की तीव्रता और फैलाव दोनों कई गुना बढ़ जाते हैं।

आईसीयू के मरीज सबसे ज्यादा असहाय

आग जैसी आपात स्थिति में सबसे ज्यादा खतरा आईसीयू में भर्ती मरीजों को होता है। यहां अधिकांश मरीज वेंटिलेटर, मानिटर और आक्सीजन सपोर्ट पर निर्भर रहते हैं। कई मरीज खुद चलने-फिरने की स्थिति में भी नहीं होते।

ऐसे में अचानक आग लगने पर उन्हें सुरक्षित बाहर निकालना सबसे कठिन चुनौती बन जाता है। धुआं फैलने, बिजली गुल होने और मशीनों के बंद पड़ने से स्थिति और भयावह हो जाती है। पैनेसिया हादसे में भी कई मरीज और उनके स्वजन धुएं और अफरातफरी के बीच जान बचाने की कोशिश करते नजर आए।

जहरीले धुएं ने बढ़ाया मौत का खतरा

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, एसी यूनिट से फैली आग के कारण आईसीयू में तेजी से जहरीला धुआं भर गया। इस दौरान कार्बन मोनो आक्साइड समेत कई घातक गैसें पूरे वार्ड में फैल गईं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे धुएं में अधिक देर तक रहने पर व्यक्ति का दम घुट सकता है। खासकर गंभीर मरीजों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति और घातक साबित होती है। रेस्क्यू टीमों को भी ऐसे वातावरण में काम करना बेहद जोखिमभरा होता है।

तंग सड़कें: हर बड़े हादसे में बढ़ता खतरा

पैनेसिया अस्पताल अग्निकांड ने सिर्फ एक अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि पूरे शहर की आपदा-तैयारी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

देहरादून की बढ़ती आबादी, बेलगाम ट्रैफिक, तंग सड़कें, अवैध पार्किंग और अनियोजित शहरी विस्तार अब सीधे जन सुरक्षा के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। शहर के कई हिस्सों में एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड का समय पर पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है।

जब हर सेकंड कीमती हो, तब जाम बन जाता है दुश्मन

आग, हार्ट अटैक, भवन ढहने या मेडिकल इमरजेंसी जैसे मामलों में शुरुआती कुछ मिनट बेहद अहम होते हैं। लेकिन देहरादून के कई क्षेत्रों में राहत और बचाव वाहनों को रास्ता तक नहीं मिल पाता। रिस्पना, पटेलनगर, घंटाघर, चकराता रोड, राजपुर रोड, सहारनपुर रोड, प्रेमनगर और धर्मपुर जैसे इलाकों में दिनभर भारी ट्रैफिक बना रहता है।

सड़क किनारे अवैध पार्किंग और अतिक्रमण के कारण कई जगह वाहन रेंगते नजर आते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि यदि किसी बहुमंजिला अस्पताल, स्कूल या व्यावसायिक भवन में बड़ा हादसा हो जाए, तो क्या फायर ब्रिगेड और एंबुलेंस समय पर मौके तक पहुंच पाएंगी?

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