बस्ती का नाम वशिष्ठ नगर किए जाने की जगी उम्मीद, प्रशासन ने भेजी रिपोर्ट

 जनपद का नाम परिवर्तित करने की उम्मीद जग गई है। बदला हुआ नाम बस्ती की जगह वशिष्ठ नगर हो सकता है। जगतगुरु राम भद्राचार्य के शिष्य व उत्तर प्रदेश राज्य पंचायत परिषद के अध्यक्ष राणा दिनेश प्रताप सिंह के प्रस्ताव पर जिलाधिकारी ने अपनी आख्या मंडलायुक्त को सौंप दिया है, जिस पर मंडलायुक्त ने भी प्रशासनिक अनापत्ति के बारे में आयुक्त एवं सचिव राजस्व परिषद को पत्र लिखा है।

बीते फरवरी माह में जगतगुरु राम भद्राचार्य ने यहां बढ़नी मिश्र में श्रीराम कथा का आयोजन किया था। उन्होंने नाम बदले जाने के लिए मंडलायुक्त अखिलेश सिंह से वार्ता की थी, सार्वजनिक रूप से कहा था कि इसके लिए जरूरत पड़ी तो वह मुख्यमंत्री से भी मुलाकात करेंगे। उसके बाद नाम बदलने की कवायद शुरू की गई।

वैसे जिला का नाम बदलने की मांग पिछले दो दशक से हो रही है। पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी और हर्रैया विधायक अजय सिंह ने भी इसके लिए शासन को पत्र लिख चुके हैं। जिलाधिकारी कृत्तिका ज्योत्सना ने कमिश्नर को प्रेषित अपनी रिपोर्ट में अवगत कराया है कि पुरातन काल में इसी क्षेत्र के मखौड़ा में राजा दशरथ द्वारा ऋषि वशिष्ठ के अनुरोध पर पुत्रेष्ठि यज्ञ का आयोजन किया गया था, उसके बाद ही राजा दशरथ के चारों पुत्रों श्रीराम, भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

लोकमन के अनुसार जनपद बस्ती का पौराणिक नाम वशिष्ठी था, जहां प्रभु श्रीराम सहित उनके भाइयों ने शिक्षा दीक्षा प्राप्त किया था। यद्यपि कि उपलब्ध जिला गजेटियर में इसका उल्लेख नहीं है। इस संबंध में मुख्यमंत्री द्वारा कोई घोषणा नहीं की गई है। बस्ती जनपद का नाम वशिष्ठ नगर अथवा वशिष्ठी किए जाने के संबंध में प्रशासनिक अनापत्ति दिया गया है। चार मई 2026 को जिलाधिकारी ने अपनी रिपोर्ट कमिश्नर को दी है, जबकि कमिश्नर ने 17 मई को अपनी रिपोर्ट शासन को भेजा है।

बता दें कि बस्ती जनपद का गठन 6 मई 1865 को हुआ था, गोरखपुर से अलग कर इसे जिला बनाया गया था। राज घराने से जुड़ी राजमाता एवं रेलवे की पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अशिमा सिंह पहले से बस्ती का नाम वशिष्ठ नगर लिखती आ रही हैं। होम्योपैथ के चिकित्सक डाक्टर विरेन्द्र नाथ त्रिपाठी और सनातन धर्म संस्था के संरक्षक अखिलेश दूबे भी यही नाम लिखते हैं।

तत्कालीन कमिश्नर ने भी लिखा था पत्र

वर्ष 2020 में 28 नवंबर को पहली बार तत्कालीन जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन ने प्रस्ताव तैयार करके रिपोर्ट तत्कालीन कमिश्नर अनिल कुमार सागर को सौंपी थी। कमिश्नर की तरफ से रिपोर्ट राजस्व परिषद को भेजी गई थी, जिस पर राजस्व परिषद की ओर से नाम बदले जाने की स्थिति में होने वाले व्यय की जानकारी मांगी गई थी।

खर्च आकलन कराने के बाद जिलाधिकारी ने मंडलायुक्त को रिपोर्ट दी थी, जिस पर संशोधित प्रस्ताव के साथ मंडलायुक्त ने प्रस्ताव राजस्व परिषद को भेज दी थी, जिसमें एक करोड़ रुपये खर्च होने की उम्मीद जताई गई थी।

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