केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि संविधान के तहत चुनाव आयोग की नियुक्ति समिति में न्यायिक प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है। सरकार ने स्पष्ट किया कि चयन समिति में न्यायपालिका के सदस्य को शामिल करना “विधायी निर्णय” हो सकता है, लेकिन यह कोई “संवैधानिक बाध्यता” नहीं है।
केंद्र ने यह दलील मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दाखिल प्रति-हलफनामे में दी है।
2 जनवरी 2024 से लागू इस कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है।
समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। नए कानून में भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है।
केंद्र ने हलफनामे में कहा कि संविधान में कहीं भी चुनाव आयोग की नियुक्ति समिति में न्यायिक प्रतिनिधित्व का प्रविधान अनिवार्य नहीं किया गया है।
सरकार के अनुसार, यह कहना कि नियुक्तियों की वैधता के लिए न्यायपालिका की भागीदारी जरूरी है, शक्तियों के पृथक्करण और संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत संसद की भूमिका की गलत व्याख्या है।
सरकार ने कहा कि चुनाव आयोग की वास्तविक स्वतंत्रता उसके संवैधानिक दर्जे, सुरक्षित कार्यकाल, हटाने संबंधी सुरक्षा उपायों तथा वेतन और कार्यों के वैधानिक संरक्षण से सुनिश्चित होती है। 2023 का कानून इन सभी प्रावधानों को बरकरार रखते हुए नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता जोड़ता है।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के 2 मार्च 2023 के अनूप बरनवाल फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने उस समय अंतरिम व्यवस्था के तौर पर सीजेआइ को चयन समिति में शामिल करने की बात कही थी, जो केवल तब तक लागू थी जब तक संसद इस संबंध में कानून न बना दे।
सरकार ने यह भी कहा कि अब तक नियुक्त किसी भी चुनाव आयुक्त की योग्यता या निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है। साथ ही, याचिकाकर्ताओं के इस आरोप को भी खारिज किया गया कि न्यायपालिका के बिना चयन समिति पक्षपातपूर्ण हो जाएगी।


