प्रवासियों को रास आने लगी उत्तराखंड की माटी, सरकार बनाएगी रोजगारपरक नीतियां

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन का दर्द अब घर वापसी की उम्मीद में बदलने लगा है। देश और विश्व के अलग-अलग कोनों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे प्रवासियों का मन अब जड़ों की ओर लौटने को मचल रहा है। पलायन निवारण आयोग के आंकड़ों पर ही गौर करें तो छह हजार से ज्यादा प्रवासी गांव लौटकर खेती, बागवानी, पर्यटन जैसे क्षेत्रों में किस्मत आजमा रहे हैं।

इस रुझान को देखते हुए पलायन निवारण आयोग अब सरकार को यह सुझाव देने जा रहा है कि घर वापसी करने वाले प्रवासियों के लिए रोजगारपरक नीतियों को अधिक फ्रेंडली बनाने को इनमें बदलाव किए जाएं।

गांवों से हो रहे पलायन को थामने के दृष्टिगत सरकार ने गांवों में मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के साथ ही आजीविका विकास पर ध्यान केंद्रित किया है। इसके साथ ही प्रवासियों की घर वापसी पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। पलायन निवारण आयोग के विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि बड़ी संख्या में प्रवासी अपने मूल गांव अथवा उसके आसपास लौटने के इच्छुक हैं। बावजूद इसके, निवेश और स्वरोजगार के जटिल नियम उनकी इस राह में कहीं न कहीं बाधक भी बन रहे हैं। अब इसके समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा है।

जिला स्तर पर हो सिंगल विंडो सिस्टम

पलायन निवारण आयोग के उपाध्यक्ष डा एसएस नेगी के अनुसार प्रवासियों की इच्छा को देखते हुए आयोग अब सरकार को सुझाव देने जा रहा कि सभी जिलों में डीएम के स्तर पर सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया जाए। इसके माध्यम से घर वापसी करने वालों को जिस योजना का वे लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें इसकी जानकारी मिल सकेगी। इसके साथ ही यह सुझाव भी दिया जा रहा है कि प्रत्येक जिले में डीएम प्रतिमाह प्रवासियों के साथ संवाद करें।

तकनीकी सहायता व ऋण प्रकिया हो शिथिल

आयोग का मानना है कि यदि प्रवासियों को ग्रामीण स्तर पर तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने के साथ ही बैंकों से ऋण लेने के मानकों को थोड़ा शिथिल किया जाए तो इससे प्रवासियों को बड़ी राहत मिलेगी। इससे वे राज्य की आर्थिकी की रीढ़ बन सकते हैं।

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