पंजाब की प्रमुख औद्योगिक इकाई ट्राइडेंट लिमिटेड को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से शुक्रवार को महत्वपूर्ण अंतरिम राहत मिली, जब अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा चरण पर पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यह दिखाने में विफल रहा है कि कंपनी की इकाई से जहरीले अपशिष्टों द्वारा जलधाराओं, भूमि या पर्यावरण को ऐसा कोई आपातकालीन नुकसान पहुंच रहा है, जिसके आधार पर तत्काल दंडात्मक या कठोर कार्रवाई आवश्यक हो।
चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने आदेश दिया कि बोर्ड किसी भी प्रकार की सख्त दंडात्मक कार्रवाई तभी कर सकेगा, जब कंपनी को कथित ‘मामूली खामियों/कमियों’ को दूर करने के लिए 30 दिन का उचित अवसर दिया जाए।
ओपन कोर्ट में आदेश सुनाते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि चूंकि बोर्ड फिलहाल किसी उभरती हुई गंभीर प्रदूषणीय आपदा को स्थापित नहीं कर पाया है, इसलिए न्यायसंगत यही होगा कि कंपनी को पहले सुधार का अवसर दिया जाए। अदालत ने साथ ही ट्राइडेंट को यह स्वतंत्रता भी प्रदान की कि यदि बोर्ड भविष्य में कोई कठोर कदम उठाता है तो कंपनी राष्ट्रीय हरित अधिकरण का दरवाजा खटखटा सकती है।
ट्राइडेंट ने लगाया था प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का आरोप
यह मामला 30 अप्रैल को ट्राइडेंट परिसर में हुई निरीक्षण कार्रवाई के बाद शुरू हुए तीखे टकराव के केंद्र में था। ट्राइडेंट ने अदालत में आरोप लगाया था कि निरीक्षण केवल वैधानिक प्रक्रिया नहीं बल्कि उसके संस्थापक एवं राज्यसभा सांसद राजिंदर गुप्ता के राजनीतिक रुख में बदलाव के बाद प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का हिस्सा था।
कंपनी की ओर दलील दी कि हाल ही में आवश्यक कंसेंट मिलने के बावजूद अचानक निरीक्षण की टाइमिंग संदेह पैदा करती है और सैंपलिंग प्रक्रिया में पर्यावरण कानून के तहत अनिवार्य सुरक्षा उपायों का पालन नहीं हुआ।
वहीं, बोर्ड की ओर से राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों को ‘कल्पना’ करार देते हुए कहा कि अभी तक कंपनी के खिलाफ कोई अंतिम प्रतिकूल आदेश ही पारित नहीं हुआ, इसलिए याचिका समयपूर्व है।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने निरीक्षण के समय और परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए माना था कि परिस्थितियां आशंका जरूर उत्पन्न करती हैं। हालांकि, केवल आशंका ही अंतिम निष्कर्ष का आधार नहीं हो सकती। अदालत ने साफ किया कि कोई भी नियामकीय कार्रवाई कानून, निर्धारित प्रक्रिया और उपलब्ध वैधानिक उपचारों के अनुरूप ही होनी चाहिए।


