न्याय की तलाश में अक्सर लोग भावुकता और जल्दबाजी में सीधे उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटाते हैं, विशेषकर जब पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी करे। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि न्याय की सीढि़यां लांघी नहीं जा सकतीं।
इसने कहा कि यदि पुलिस एफआइआर दर्ज नहीं करती, तो सीधे उच्च न्यायालय जाने के बजाय नागरिक को पहले कानून द्वारा निर्धारित वैकल्पिक कानूनी रास्तों का पालन करना अनिवार्य है।
असाधारण अधिकार क्षेत्र का विवेकपूर्ण उपयोग न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति आगस्टीन जार्ज मसीह की पीठ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 की व्याख्या करते हुए कहा कि उच्च न्यायालयों के पास रिट जारी करने की शक्ति व्यापक तो है, लेकिन यह ‘असाधारण’ और ‘विवेकाधीन’ है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि किसी अधिकारी ने लापरवाही बरती है, उच्च न्यायालय को सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जब तक कि स्थिति अत्यंत गंभीर या आपातकालीन न हो, तब तक कानूनी ढांचे के भीतर उपलब्ध विकल्पों को दरकिनार करना न्यायिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है।
बीएनएसएस का क्रमिक ढांचा और कानूनी प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 का हवाला देते हुए एक व्यवस्थित क्रम समझाया। न्यायालय के अनुसार, सबसे पहले धारा 173(1) के तहत थाना प्रभारी को सूचना दी जानी चाहिए।
यदि एफआइआर दर्ज न हो, तो धारा 173(4) के तहत संबंधित पुलिस अधीक्षक के पास जाना चाहिए। इसके बाद भी समाधान न मिलने पर धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष गुहार लगानी चाहिए।
बांबे उच्च न्यायालय के एक आदेश को रद करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह संदेश दिया कि जब कानून में प्रभावी और कुशल विकल्प मौजूद हों, तो सीधे ‘असाधारण अधिकार क्षेत्र’ का सहारा लेना उचित नहीं है। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में अनुशासन और वैधानिक उपचारों के महत्व को रेखांकित करता है।


