जम्मू-कश्मीर में प्रदूषण और मौसम बदलाव से बढ़ा अस्थमा का खतरा, अस्पतालों में 20% बच्चे सांस की बीमारी से पीड़ित

 लगातार बदले रहे मौसम, बढ़ रहे प्रदूषण और इंफेक्शन के कारण अस्थमा की बीमारी जम्मू-कश्मीर में भी बढ़ रही है। आलम यह है कि अस्पतालों में छाती से संबंधित बीमारी का इलाज करवाने वाले बीस प्रतिशत बच्चों में अस्थमा या फिर सांस संबंधी अन्य समस्याओं की शिकायत है। डाक्टरों का कहना है कि अस्थमा से बचाव के लिए एहतियात बरतने की जरूरत है।

जम्मू-कश्मीर में हालांकि अस्थमा पर कोई सर्वे तो नहीं है लेकिन अस्पतालों से मिली जानकारी के अनुसार बच्चे अस्थमा से सबसे अधिक पीड़ित है। अस्पतालों में इलाज के लिए आने वाले बच्चों में अस्थका की बहुत शिकायत है। इसका एक प्रमुख कारण लगातार बढ़ रहा प्रदूषण भी है।

जम्मू-कश्मीर में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। निर्माण कार्य जगह-जगह पर हो रहे हैं। ईंट भट्ठों, तारकोल की फैक्ट्रियों, सीमेंट और अन्य उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण के कारण समस्या बढ़ रही है। डाक्टरों का कहना है कि औद्यौगिक क्षेत्रों में अस्थमा की शिकायत होने की अधिक आशंका रहती है।

श्री महाराजा गुलसब सिंह अस्पताल में बाल रोग विभाग के एचओडी डा. संजीव ढिगरा का कहना है कि बार-बार खांसी हो रही है, सांस फूल रही है और सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज हो रही है तो यह अस्थमा हो सकता है। इसमें कई बार छाती में जकड़न रहती है। उनका कहना है कि बच्चों में अस्थमा की शिकायत अधिक रहती है। लेकिन इसमें घबराने की कोई जरूरत नहीं है।

समय पर दवाई लेने से सामान्य जिंदगी जी जा सकती है। उनका कहना है कि इन्हेलर सबसे सुरक्षित है। कई लोग इन्हेलर से घबराते हैं लेकिन इन्हेलर से दी जाने वाली दवाई सीधे फेफड़ों पर असर करती है। ऐसे दवा खाने से शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित होते हैं। उन्होंने अस्थमा से पीड़ितों को इन्हेलर का ही इस्तेमाल करने की सलाह दी।

प्रदूषण से बच्चों को बचाएं

डॉ. ढिगरा ने कहा कि बच्चों को अगर अस्थमा से बचाना है तो उन्हें प्रदूषण से बचाएं। धूल व मिट्टी से बचाएं। घरों में झाडू लगाने से जो धूल उडती है, उससे भी सांस संबंधी समस्या होती है। इसके अतिरिक्त अगरबती का धुंआ, पाउडर से भी समस्या हो सकती है। इन सभी का कम इस्तेमाल करना चाहिए। घर में धूल से बचने के लिए पोचा लगाएं।सिगरेट पीने से भी बचेें।सिगरेट का धुंआ भी बच्चों में अस्थमा की शिकायत करता है। घरों में बिस्तर पर लगाने वाले गद्दों को धूप में जरूर रखें। समय-समय पर एंयर कंडीशनर के फिल्टर साफ करें।डाक्टरों का कहना है कि इंफेक्शन को तो नियंत्रण में किया गया है लेकिन एलर्जी की समस्या बढ़ी हैं।भारत में 35 मिलीयन लोगों को अस्थमा है।

कटाई का मौसम और निर्माण कार्य

डाक्टरों का कहना है कि इन दिनों कनक की कटाई का मौसम है। कटाई के दौरान उड़ने वाले धूल के कणों से समस्या बढ़ती है। इस मौसम में ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों में बड़ी समस्या है।हर तीसरे बच्चे में अस्थमा की समस्या देखने को मिलती है। इसके अतिरिक्त शहरों में लगातार हो रहे निर्माण कायों के कारण भी धूल उड़ती रहती है। सड़कों का निर्माण कार्य, फ्लाईओवर, मकानों का निर्माण कार्य यब सब प्रदूषण को बढ़ाता है।

डॉ. ढिगरा का कहना है कि बच्चों में अस्थमा कई बार घर में किसी और को होने के कारण भी होता है। वहीं, बुखार, इंफेक्शन के कारण भी अस्थमा होता है।बचाव के लिए यह जरूरी है कि नियमित तौर पर व्यायाम होना चाहिए। बच्चों को नियमित पौष्टिक आहार दें। डाक्टरों का कहना है कि अस्थमा के मरीजों का उपचार तभी संभव है जब आप समय रहते डॉक्टर से संपर्क करें।

अस्थमा के मरीजों के लिए यह जरूरी है कि वे धूल भरी आंधी से बचें। यही नहीं जिस क्षेत्र में अधिक प्रदूषण हो, वहां पर भी जाने से बचना चाहिए। अगर जरूरी जाना हो तो मास्क पहन कर जाएं। धूंध, सिगरेट पीने वालों से दूर रहें। अस्थमा के मरीजों को अपने साथ इन्हेलर भी रखना चाहिए।

यह है अस्थमा

अस्थमा फेफड़ों की एक बीमारी हैए जिसके कारण सांस लेने में कठिनाई होती है। अस्थमा होने पर सांस नलियों में सूजन आ जाती है जिस कारण मरीज को सांस लेने में परेशानी आती है। इसमें खांसी भी होती है और छाती में जकडऩ महसूस होती है। डाक्टरों के अनुसार खांसी को कभी भी हल्के में न लें। बच्चे अधिक दिनों तक खांसते हैं तो तुरंत जांच कराएं। यह एक शारीरिक रोग है जो सांस की नालियों के सिकुडऩे के कारण होता है। स्पायरोमीटरी नामक उपकरण से इसका पता लगाया जा सकता है।

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