तालाब को पाटकर बसाईं कॉलोनियां, अब ‘प्यासे शहर’ की ओर बढ़ रहा भागलपुर

 भागलपुर में तालाबों का लगातार मिटना आने वाले बड़े जलसंकट की स्पष्ट चेतावनी है। कभी शहर की प्यास बुझाने वाले तालाब अब खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

शहरीकरण की अंधी दौड़ में एक-एक कर जलस्रोतों को पाटकर कालोनियां बसाई गईं और इसका सीधा असर भूगर्भ जलस्तर पर पड़ा।

डेढ़ दशक पहले जहां 30 से 45 फीट पर पानी मिल जाता था, वहीं अब सामान्य दिनों में 80 से 100 फीट नीचे और गर्मी के दिनों में 150 फीट तक जलस्तर खिसक जाता है।

कई इलाकों में बोरिंग फेल होने लगी है, जिसके कारण लोगों को 300 से 350 फीट तक बोरवेल कराना पड़ रहा है। यदि यही हाल रहा तो तालाबों पर बसती कॉलोनियां आने वाले समय में ‘प्यासे शहर’ की सबसे बड़ी वजह बनेंगी।

विडंबना यह है कि नगर निगम और प्रशासन इस गंभीर संकट पर अब भी अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा सके हैं। तालाबों के संरक्षण, अतिक्रमण हटाने और जीर्णोद्धार की योजनाएं वर्षों से फाइलों में कैद हैं, जबकि जमीन पर जलस्रोत लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं।

तालाब मिटे, कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए

शहर के कई प्रमुख तालाब अब इतिहास बन चुके हैं। सिकंदरपुर के बरबिग्घी और लाल तालाब, हनुमान नगर व बागबाड़ी के पोखर, वारसलीगंज का निजी तालाब और गोलाघाट की शिवपुरी कालोनी स्थित गढ़ैया पोखर को भरकर वहां आवासीय बस्तियां खड़ी कर दी गईं।

इशाकचक क्षेत्र का क्षत्रपति पोखर अब नाम भर रह गया है, वहां तेजी से कालोनियां बस रही हैं। नाथनगर के खटिक टोला का तालाब भी बस्ती में तब्दील हो चुका है।

चिंताजनक यह है कि प्रशासन की आंखों के सामने जलस्रोत खत्म होते रहे, लेकिन समय रहते रोक लगाने की ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यदि यही स्थिति रही तो बचे हुए तालाब भी जल्द कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो जाएंगे।

जहां तालाब बचे, वहां भूजल ने संभाली सांस

जिन इलाकों में तालाब अब भी बचे हैं, वहां भूगर्भ जलस्तर अपेक्षाकृत बेहतर बना हुआ है। भैरवा तालाब इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

इसके कायाकल्प के बाद आसपास के साहेबगंज क्षेत्र में भूगर्भ जलस्तर में गिरावट अपेक्षाकृत कम हुई है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि तालाब प्राकृतिक जलभंडार के रूप में वर्षा के पानी को जमीन में समाहित कर भूजल को रिचार्ज करते हैं।

भैरवा तालाब के जीर्णोद्धार को लेकर दैनिक जागरण के अभियान के बाद नगर निगम ने कार्ययोजना बनाई। इसके बाद स्मार्ट सिटी योजना के तहत इसके सुंदरीकरण की बड़ी योजना बनी, जिसे बाद में संशोधित किया गया।

तालाब की गहराई 10 मीटर तक किए जाने से इसमें पर्याप्त जलसंचय संभव हुआ। खोदाई के दौरान आसपास के चापाकल और बोरिंग कुछ समय के लिए ठप पड़ गए थे, लेकिन तालाब में पर्याप्त पानी आने के बाद आसपास का भूगर्भ जलस्तर फिर बेहतर हुआ।

कागजों में कैद पुनर्जीवन की योजनाएं

शहर के कंपनीबाग तालाब और सैंडिस स्थित नेहरू स्मारक तालाब वर्षों से जीर्णोद्धार की बाट जोह रहे हैं। कंपनीबाग तालाब के सौंदर्यीकरण के लिए करीब छह वर्ष पहले 19 लाख रुपये की योजना बनी।

इसमें छह लाख रुपये से अधिक का भुगतान भी हुआ, लेकिन अतिक्रमण हटाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई। नतीजा, तालाब का बड़ा हिस्सा झाड़ियों और अवैध कब्जों की भेंट चढ़ गया।

नेहरू स्मारक तालाब के जीर्णोद्धार के लिए अमृत मिशन 2.0 के तहत 60 लाख रुपये की योजना स्वीकृत है, लेकिन वन विभाग से एनओसी नहीं मिलने के कारण काम शुरू नहीं हो सका।

इसके ठीक बगल में मौजूद बड़े तालाब के विकास की भी कोई योजना नहीं है, जबकि इसे विकसित कर कचहरी और सैंडिस क्षेत्र में बड़े स्तर पर जलसंचयन की व्यवस्था की जा सकती है।

अब भी नहीं चेते, तो बूंद-बूंद को तरसेगा शहर

तालाब केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि शहर के जीवन का आधार हैं। सभी तालाबों का सर्वेक्षण और सीमांकन, अतिक्रमण पर सख्त कार्रवाई, वर्षा जल संचयन से जोड़कर पुनर्जीवन और जनभागीदारी से संरक्षण अभियान अब समय की मांग है।

यदि प्रशासन ने अभी भी गंभीरता नहीं दिखाई, तो भागलपुर का बड़ा हिस्सा आने वाले वर्षों में बूंद-बूंद पानी के लिए तरस सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *