लोकसभा में महिला आरक्षण पर सियासी ब्रेक, संसद में आधी आबादी अब भी ‘हाशिए’ पर; क्या कहते हैं आंकड़े?

लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन कर सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव शुक्रवार को निचले सदन में पारित नहीं हो सका। इसके साथ ही देश में एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि आखिर भारत की विधायिकाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी कितनी न्यायसंगत है।

लोकसभा में बढ़ी मौजूदगी, लेकिन लक्ष्य से दूर

भारत में महिलाओं की संसद में भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ी है। 1957 में जहां लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 5.4 प्रतिशत थी, वहीं 2024 में यह बढ़कर 13.6 प्रतिशत हो गई है। हालांकि यह सुधार अहम है, फिर भी हर सात सांसदों में एक से भी कम महिला है।

2019 में महिलाओं की हिस्सेदारी 14.4 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर थी, जो प्रस्तावित एक-तिहाई आरक्षण से काफी कम है।

चुनाव लड़ने वाली बढ़ीं, जीतने वाली नहीं

आंकड़े बताते हैं कि चुनाव लड़ने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, लेकिन यह सफलता में तब्दील नहीं हो रही।

  • 2019 में 726 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव लड़ा, जिनमें से 78 जीतकर संसद पहुंचीं (सफलता दर 10.7%)
  • 2024 में 800 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 74 ही जीत सकीं (सफलता दर 10% से कम)

यह दर्शाता है कि राजनीतिक भागीदारी बढ़ने के बावजूद जीत का प्रतिशत स्थिर या घट रहा है।

राजनीतिक दलों में भी असमानता

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़ों के अनुसार बड़े दलों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी सीमित है।

  • भाजपा: 1,877 में से 194 महिला जनप्रतिनिधि (करीब 10%)
  • कांग्रेस: 756 में से 72 महिलाएं (लगभग 10%)
  • डीएमके: 161 में से 9 (6%)
  • एआईएडीएमके: 66 में से 3 (5%)
  • शिवसेना: 64 में से 2 (3%)

वहीं तृणमूल कांग्रेस (AITC) सबसे आगे है, जहां 249 में से 45 महिला विधायक/सांसद हैं (करीब 18%)।

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