यमुनानगर में कचरे से बनेगी गैस, प्रदेश के पहले कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांट का काम तेज; सीएम सैनी खुद कर रहे निगरानी

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 प्रदेश के पहले कंप्रेस्ड बायोगैस (बीसीजी ) प्लांट के निर्माण को लेकर प्रशासन ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। संबंधित विभागों की ओर से एनओसी जारी कर दी गई है। ग्रामीणों के विरोध के बाद नगर निगम कमिश्नर महाबीर प्रसाद ने भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल ) को जमीन का कब्जा दिलाने के लिए प्रशासन को पत्र लिखा है।

वहीं, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी स्वयं इस परियोजना की मानिटरिंग कर रहे हैं और निगम कमिश्नर से इसकी स्टेटस रिपोर्ट भी ले चुके हैं। यह प्लांट गोबरधन प्रोजेक्ट के तहत स्थापित किया जा रहा है, जिसकी आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गांव कैल में आयोजित रैली के दौरान रखी गई थी। छछरौली रोड स्थित गांव मुकारबपुर में लगभग 10 एकड़ भूमि पर करीब 90 करोड़ रुपये की लागत से बनेगा।

यह परियोजना हरित ऊर्जा और स्वच्छता को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी। प्लांट में नगर निगम क्षेत्र से निकलने वाले लगभग 45,000 मीट्रिक टन ठोस कचरे का प्रबंधन किया जाएगा। जबकि डेयरियों से निकलने वाले करीब 36,000 मीट्रिक टन गोबर का निपटान भी यहीं होगा।इसके माध्यम से लगभग 9,500 मीट्रिक टन जैविक खाद और 2,600 मीट्रिक टन बायोगैस का उत्पादन किया जाएगा। साथ ही करीब 7,800 मीट्रिक टन कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन में कमी आने की संभावना है। प्लांट से तैयार गैस का उपयोग ईंधन के रूप में किया जा सकेगा।

वर्तमान में नगर निगम प्रशासन डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण और प्रबंधन पर हर वर्ष लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। बीसीजी प्लांट शुरू होने से इस खर्च में कमी आने की उम्मीद है। हालांकि, कचरे की छंटाई कर उसे प्लांट तक पहुंचाना निगम की जिम्मेदारी होगी। इसके अलावा, डेयरियों से निकलने वाला गोबर अब नालियों या सड़कों पर नहीं फैलेगा।

बल्कि इसका उपयोग प्लांट में किया जाएगा। इससे क्षेत्र में स्वच्छता सुधरेगी, सस्ती गैस उपलब्ध होगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। गोबर उठान पर होने वाला करोड़ों रुपये का वार्षिक खर्च भी इस परियोजना से कम किया जा सकेगा।

नगर निगम क्षेत्र में प्रतिदिन 250 से 300 मीट्रिक टन कचरा उत्पन्न हो रहा है, जिसे वर्तमान में कैल स्थित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट में भेजा जाता है। वहां खाद तैयार की जा रही है, लेकिन उसकी मांग सीमित है।

नगर निगम एरिया में दड़वा, रायपुर, औरंगाबाद और कैल में चार डेयरी कांप्लेक्स स्थापित हैं। इनमें करीब 225 डेयरियां संचालित हो रही हैं। यहां से प्रतिदिन 100 मीट्रिक टन से अधिक गोबर निकलता है, जिसका बड़ा हिस्सा नालियों में बहा दिया जाता है। जिससे सीवर लाइनें जाम हो जाती हैं। दड़वा सबसे बड़ा डेयरी कॉम्प्लेक्स है, जहां 135 डेयरियां स्थित हैं।

डेयरी कॉम्प्लेक्स दड़वा में 262, रायपुर में 109, औरंगाबाद में 109 और कैल में 157 प्लाट हैं। एक डेयरी में औसतन 10 से 15 पशु हैं। वर्ष 2004 में तत्कालीन सरकार ने डेयरियों को शहर से बाहर स्थानांतरित करने के लिए इन चार स्थानों पर कांप्लेक्स विकसित किए थे। वर्ष 2009-10 में प्लाट आवंटित किए गए और 2018 से डेयरियों का स्थानांतरण शुरू हुआ।

मेयर सुमन बमहनी का कहना है कि बीसीजी प्लांट को लेकर सीएम नायब सिंह सैनी गंभीर है। बीते दिनों कमिश्नर से रिपोर्ट ले चुके हैं। बीपीसीएल को जमीन पर कब्जा दिलवाने के लिए प्रशासन को लिखा गया है। क्षेत्र के लोगों के लिए यह अच्छा प्रोजेक्ट है।

यह अत्याधुनिक टेक्नालाजी पर आधारित होगा। इससे न किसी तरह का प्रदूषण हेागा और न ही क्षेत्र के लोगों को कोई दिक्कत आए। रोजगर के नए अवसर सृजित होंगे और सफाई व्यवस्था बड़ा सुधार आएगा।

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