मौसम के बदले मिजाज ने जिले के गन्ना उत्पादक किसानों के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खींच दी हैं। अप्रैल के महीने में जहां चिलचिलाती धूप और लू के थपेड़ों से गन्ने के जूस की मांग आसमान छूती थी, वहीं इस बार गर्मी में ठंडे मौसम और बेमौसमी बारिश ने समीकरण पूरी तरह बिगाड़ दिए हैं।
पिछले डेढ़ महीने से सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के कारण तापमान में आई गिरावट ने गन्ने की मिठास पर आर्थिक चोट मारी है, जिससे किसानों को प्रति क्विंटल 200 रुपये तक का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
जिले के किसानों ने इस उम्मीद में गन्ने की स्पेशल 19 नंबर वैरायटी की खेती बड़े स्तर पर की थी कि गर्मी बढ़ते ही उनके वारे-न्यारे होंगे। फरवरी के अंत में जिस तरह तापमान बढ़ा था, उसे देखकर कयास लगाए जा रहे थे कि इस बार भाव 800 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक जाएंगे।
मार्च की शुरुआत तक भाव 600 रुपये तक पहुंच भी गए थे, लेकिन उसके बाद मौसम में आए लगातार बदलाव ने खेल बिगाड़ दिया। वर्तमान में पारा 32 डिग्री सेल्सियस के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है, जिसके चलते जूस की खपत में वह तेजी नहीं आ पाई जिसकी उम्मीद थी। नतीजतन, जो गन्ना 600 रुपये में बिक रहा था, उसके खरीदार अब 400 रुपये भी मुश्किल से दे रहे हैं।
कोरोना काल की यादों ने बढ़ाई धड़कनें
मौसम की इस बेमौसमी मार ने किसानों के सामने छह साल पहले वाले कोरोना काल जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। किसानों का कहना है कि उस समय भी लाकडाउन और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उनका गन्ना खेतों में खड़ा-खड़ा सूख गया था और अंत में भारी नुकसान सहकर उसे चीनी मिलों में डालना पड़ा था।
आज फिर वही डर सता रहा है कि यदि मई महीने तक यही स्थिति रही और गर्मी ने जोर नहीं पकड़ा, तो खरीदार पूरी तरह बाजार से गायब हो जाएंगे। ऐसे में लाखों की लागत से तैयार फसल खेतों में ही बर्बाद हो सकती है।
इन गांवों में है गन्ने का बड़ा रकबा
जिले के काजल हेड़ी, कुम्हारिया, गोरखपुर, बड़ोपल, धांगड़ और मोहम्मदपुर रोही सहित अनेक ऐसे गांव हैं, जहां के किसान मुख्य रूप से जूस वाले गन्ने पर निर्भर हैं। यहां से गन्ने की सप्लाई केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के अन्य जिलों में बड़े स्तर पर होती है। लेकिन दिल्ली और राजस्थान के बाजारों में भी पारा कम होने के कारण वहां से डिमांड में भारी कमी आई है।
व्यापारियों की मनमानी और किसानों की बेबसी
गन्ना उत्पादकों का आरोप है कि मौसम का फायदा उठाकर थोक व्यापारी अब अपनी मनमानी पर उतर आए हैं। जो व्यापारी कुछ समय पहले एक एकड़ फसल का भाव पौने दो लाख रुपये तक लगा रहे थे, अब वे क्विंटल के हिसाब से खरीद करने में भी आनाकानी कर रहे हैं।
किसानों का कहना है कि आधा अप्रैल बीत चुका है और अब भी मौसम में वह तपिश नहीं है जो गन्ने के कारोबार को गति दे सके। यदि आने वाले दिनों में कुदरत ने साथ नहीं दिया, तो गन्ना उत्पादक किसानों का यह सीजन आर्थिक तबाही की भेंट चढ़ जाएगा।


