भारतीय निर्वाचन आयोग (EC) ने आदर्श आचार संहिता (MCC) के उल्लंघन से निपटने की अपनी दशकों पुराने नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए नियमों के तहत अब चुनाव आयोग आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के लिए नोटिस जारी करने की जगह सीधे एफआईआर दर्ज करवा रहा है।
दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिया गया यह फैसला चुनावी प्रक्रिया को तेज करने और कानूनी सख्ती बढ़ाने के उद्देश्य से लिया गया है। क्योंकि, चुनावों के कम चरणों में और कम समय में संपन्न होने के कारण, नोटिस जारी करने, जवाब मांगने और फैसला सुनाने की समय लेने वाली प्रक्रिया अब चुनाव प्रचार के सीमित समय में पूरी कर पाना मुश्किल होता है।
क्यों नहीं नोटिस भेजेगा चुनाव आयोग?
चुनाव आयोग के अनुसार, नोटिस और चेतावनी जैसे कदम अक्सर बेअसर साबित होते हैं, जबकि FIR के माध्यम से ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम’ के तहत अपराधियों पर सीधी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सकती है।
बिना नोटिस दर्ज हुई FIR
इस बार, 7 अप्रैल को असम में एक चुनावी रैली के दौरान मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा की गई सांप्रदायिक टिप्पणियों पर (BJP के अनुरोध के बावजूद) या 5 अप्रैल को कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा द्वारा असम के मुख्यमंत्री की पत्नी पर लगाए गए कई पासपोर्ट होने के आरोप पर MCC का कोई नोटिस जारी नहीं किया गया। इन दोनों ही मामलों में FIR दर्ज की गईं।
चूंकि आदर्श आचार संहिता के तहत अधिकांश उल्लंघन- जैसे सांप्रदायिक अपील, निजी हमले, अभद्र भाषा का इस्तेमाल, भ्रष्ट आचरण और मतदाताओं को डराना-धमकाना, पहले से ही आपराधिक कानूनों और ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (Representation of the People Act) के दायरे में आते हैं, इसलिए अधिकारियों का कहना है कि गंभीर मामलों से निपटने के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इससे चुनाव आयोग अपना पूरा ध्यान चुनाव के सुचारू संचालन पर केंद्रित कर पाता है।
सीधे FIR करना साझेदारी भरा कदम
एक अधिकारी ने कहा, “जब कोई अपराध स्पष्ट रूप से साबित हो रहा हो, तो नोटिस जारी करने की लंबी प्रक्रिया में उलझने के बजाय स्थानीय अधिकारियों से सीधे FIR दर्ज करवाने के लिए कहना ज्यादा समझदारी भरा कदम होता है।”
उन्होंने यह भी बताया कि चेतावनी या निंदा जैसे कदम अक्सर अपराधों को रोकने में नाकाम रहते हैं, और एक ही तरह के उल्लंघन बार-बार होते रहते हैं।
FIR दर्ज करवाना उचित कानूनी प्रक्रिया
अधिकारियों ने कहा कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ MCC नोटिस जारी करने पर अक्सर चुनाव आयोग पर पक्षपात करने के आरोप लगने लगते हैं। जहां एक ओर सत्ताधारी दल के नेता आमतौर पर अपनी बयानबाजी में ज्यादा संयम बरतते हैं, वहीं विपक्षी नेता अक्सर ज्यादा आक्रामक तेवर अपनाते हैं।
इसके विपरीत, FIR दर्ज करवाना एक उचित कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा होता है, जिससे चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगने की गुंजाइश काफी कम हो जाती है।
पहली बार कब लागू हुई आचार संहिता?
आचार संहिता सबसे पहले 1960 के विधानसभा चुनावों के दौरान केरल में लागू की गई थी, और 1991 में टी.एन. शेषन के कार्यकाल के दौरान इसे राष्ट्रीय स्तर पर और बेहतर बनाया गया; उसी साल हुए आम चुनावों से इसे और भी सख्ती से लागू किया जाने लगा।


