पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मोहाली में सड़कों के टेंडर आवंटन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत का मंच निजी विवादों को जनहित का रूप देकर पेश करने के लिए नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया और इसे पीजीआइ के गरीब मरीज कल्याण कोष में 15 दिनों के भीतर जमा कराने के निर्देश दिए।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने की। याचिका मोहाली के डिप्टी मेयर कुलजीत सिंह बेदी द्वारा दायर की गई थी, जिसमें ‘मोहाली नेक्स्ट जेनरेशन प्रोग्राम’ के तहत सड़कों के उन्नयन, री-सरफेसिंग और सौंदर्यीकरण से जुड़े टेंडर प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए गए थे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी राजनीतिक संबद्धता का खुलासा करते हुए हलफनामा तो दायर किया, लेकिन याचिका में प्रस्तुत तथ्यों में गंभीर विसंगतियां सामने आईं।
कोर्ट ने विशेष रूप से उस तालिका का उल्लेख किया जिसमें चंडीगढ़ के न्यू चंडीगढ़ स्थित मेडिसिटी में 45 मीटर चौड़ी सड़क पर बागवानी कार्य का उल्लेख था, जबकि अन्य कार्य अलग-अलग ठेकेदारों को आवंटित बताए गए थे।
जब इस पर स्पष्टीकरण मांगा गया तो याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि यह जानकारी किसी अन्य दस्तावेज से ली गई थी और तथ्यात्मक रूप से गलत है। हालांकि, अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज इस दावे का समर्थन नहीं करते।
अदालत ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता ने कथित अनियमितताओं को लेकर कई शिकायतें करने का दावा किया, लेकिन इनमें से किसी भी प्रतिनिधित्व का कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया।
खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह मामला वास्तविक जनहित का नहीं बल्कि व्यक्तिगत हित का प्रतीत होता है, जिसे जनहित याचिका का रूप देने का प्रयास किया गया।


