बारिश से भीगा घना जंगल, ऊंचे-नीचे पहाड़ और चारों ओर फैली गहरी खामोशी इन्हीं परिस्थितियों के बीच ट्रेकर शारन्या ने चार दिन और तीन रातें अकेले बिताईं। यह कहानी सिर्फ खो जाने की नहीं, बल्कि हिम्मत, धैर्य और उम्मीद की एक जीवंत मिसाल है।
केरलम की 36 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल शारन्या अपने दस सदस्यों के ट्रेकिंग समूह के साथ कर्नाटक की ताडियांडामोल पहाडि़यों पर गई थीं। उतरते समय उन्होंने एक अलग रास्ता चुना, जो उन्हें अनजाने में जंगल की गहराइयों में ले गया। जब उन्हें एहसास हुआ कि वे रास्ता भटक चुकी हैं, तो उन्होंने तुरंत होमस्टे में फोन कर अपनी स्थिति बताई। यह उनका आखिरी संपर्क था, क्योंकि इसके तुरंत बाद उनका मोबाइल बंद हो गया।
चार दिनों तक नहीं मिला खाना
अब उनके पास न खाना था, न संपर्क का कोई साधन। उन्होंने पास बहती एक छोटी धारा का पानी पीकर खुद को जीवित रखा। हर शाम जब अंधेरा उतरता, तो जंगल जुगनुओं की रोशनी से जगमगा उठता, मानो प्रकृति खुद उनका हौसला बढ़ा रही हो। चांदनी और तारों से भरा आसमान उनके अकेलेपन को एक अनोखी शांति देता।
शारन्या ने नहीं हारी हिम्मत
डर और अनिश्चितता के बीच भी शारन्या ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने चट्टानों पर शरण ली, ताकि जंगली जानवरों से सुरक्षित रह सकें और खुले स्थानों पर रहीं ताकि बचाव दल की नजर उन तक पहुंच सके। चार दिनों तक चले लगातार खोज अभियान के बाद आखिरकार स्थानीय लोगों ने उन्हें ढूंढ निकाला।
जब बचाव दल उनके पास पहुंचा, तो वे शांत, संयमित और मुस्कुराती हुई बाहर आईं। घर लौटते ही जहां परिवार की आंखों में राहत के आंसू थे, वहीं शारन्या के दिल में डर नहीं, बल्कि और भी मजबूत हुआ साहस था। यह अनुभव उनके लिए सिर्फ एक संघर्ष नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और प्रकृति से जुड़ाव की एक नई कहानी बन गया।


