बंगाल के मालदा जिले में एसआईआर के काम में लगे सात न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक घेरने और उन पर हमले की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।
कोर्ट ने इसे न्यायपालिका को डराने-धमकाने की ‘सुनियोजित कोशिश’ करार देते हुए साफ किया कि यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को चुनौती देने जैसा है।
कोर्ट ने एसआईआर के काम में लगे न्यायिक अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के लिए चुनाव आयोग को केंद्रीय बलों की तैनाती करने के आदेश दिए हैं।
शीर्ष अदालत ने प्रशासन और पुलिस को उनकी निष्क्रियता के लिए कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि मालदा जिले को देखा जाए तो कानून-व्यवस्था का तंत्र पूरी तरह चरमरा गया है। कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, डीजीपी व अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए स्पष्टीकरण मांगा है।
अधिकारियों को छह अप्रैल को आनलाइन पेश होने का आदेश भी दिया है। इसके साथ ही चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह मालदा की घटना की जांच सीबीआइ या एनआईए को सौंपे। जांच एजेंसी मामले की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट छह अप्रैल को सीधे कोर्ट को सौंपेगी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मालदा में एसआइआर के काम में लगे सात न्यायिक अधिकारियों के घेराव और उन पर हमले की घटना का संज्ञान लेते हुए गुरुवार को ये आदेश दिए।
बुधवार दोपहर बाद करीब साढ़े तीन बजे मालदा के कालिया चौक इलाके में कुछ असामाजिक तत्वों ने सात न्यायिक अधिकारियों का घेराव कर लिया था जिनमें तीन महिला अधिकारी शामिल थीं। देर रात 12 बजे के बाद किसी तरह अधिकारियों को सुरक्षित निकाला गया। लेकिन जब वे अपने निवास की ओर जा रहे थे, तब उनकी गाड़ियों पर पथराव किया गया और लाठी डंडों से हमला हुआ।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें इस संबंध में कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पत्र प्राप्त हुआ है जिसमें इस घटना का जिक्र है।
जस्टिस सूर्यकांत ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के मुताबिक वरिष्ठ अधिकारियों को घटना की सूचना दिए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई और अंत में उन्हें स्वयं (जस्टिस सूर्यकांत) मौखिक तौर पर कड़ा आदेश देना पड़ा।
कोर्ट ने कहा कि मालदा की घटना सामान्य नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने और अधिकारियों का मनोबल गिराने की सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है। कोर्ट ने भीड़ नियंत्रण के लिए भी सख्त आदेश दिए हैं।
कोर्ट ने आदेश दिया कि एसआईआर की आपत्तियों पर सुनवाई के दौरान एक समय में पांच से अधिक लोगों को प्रवेश न दिया जाए और पांच से अधिक लोगों के जमावड़े पर रोक लगाई जाए।
शीर्ष अदालत ने कहा, अधिकारियों को यह बताना होगा कि सूचित किए जाने के बाद भी उन्होंने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित क्यों नहीं की। देर रात तक न्यायिक अधिकारी बंधक रहे, खाना-पानी तक नहीं दिया गया।
प्रधान न्यायाधीश ने घटनाक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि दोपहर 3:30 बजे घेराव शुरू हुआ और हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने तुरंत राज्य के अधिकारियों को इसकी सूचना दी। रात 8:30 बजे तक बार-बार गुहार लगाने के बावजूद अधिकारियों ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
रात 8:30 बजे तक जब कुछ भी नहीं किया गया। तब रजिस्ट्रार जनरल ने गृह सचिव और डीजीपी से संपर्क किया। जल्द कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। लेकिन अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की।
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने गृह सचिव और डीजीपी को ग्रुप काल किए।
शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पत्र देखकर इस बात पर नाखुशी जताई कि मुख्य सचिव से इसलिए संपर्क नहीं किया जा सका था क्योंकि उन्होंने अपना वाट्सएप नंबर उपलब्ध नहीं कराया था।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों, गृह सचिव, डीजीपी, जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर उनसे जवाब-तलब किया है। सुनवाई के दौरान तृणमूल कांग्रेस सांसद व वकील कल्याण बनर्जी और चुनाव आयोग के वकील के बीच तीखी बहस हुई।
घटना को अराजनीतिक विरोध प्रदर्शन बताने की दलीलों पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ”अगर यह विरोध-प्रदर्शन गैर-राजनीतिक था, तो फिर राजनीतिक नेता वहां क्या कर रहे थे? क्या यह उनका फर्ज नहीं था कि वे मौके पर पहुंचकर देखें कि वहां क्या हो रहा है, कि कोई कानून-व्यवस्था को अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रहा है? इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया था और रात 11 बजे तक भी आपके कलेक्टर वहां मौजूद नहीं थे।”
बता दें कि बंगाल, ओडिशा और झारखंड के 700 से अधिक न्यायिक अधिकारियों को चल रही एसआइआर प्रक्रिया में तैनात किया गया है, ताकि उन 60 लाख से अधिक आपत्तियों से निपटा जा सके, जिन्हें एसआइआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूचियों से बाहर कर दिया गया है।
इस राज्य में हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है, यह सबसे अधिक ध्रुवीकृत राज्य : सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान जब बंगाल के एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता ने कहा कि इस मामले में चुनाव आयोग को विरोधी की तरह काम नहीं करना चाहिए तो इस पर प्रधान न्यायाधीश ने उनसे कहा कि दुर्भाग्य से आपके राज्य में हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है और यह सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्य है।
मैं रात में दो बजे तक हर चीज पर रख रहा था नजर : सीजेआइ
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान बंगाल के एडवोकेट जनरल से कहा, ‘आप हमें टिप्पणियां करने को मजबूर कर रहे हैं। आपको क्या लगता है कि हमें नहीं पता पता कि उपद्रवी कौन हैं। मैं रात में दो बजे तक हर चीज पर नजर रख रहा था। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।’


