उत्तराखंड में धामी मंत्रिमंडल के विस्तार को प्रशासनिक दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पुष्कर सिंह धामी सरकार के इस फैसले में न केवल राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश दिखी है, बल्कि शासन-प्रशासन में कार्यों के बोझ को कम करने की दिशा में भी पहल हुई है। इससे कार्यों का विकेंद्रीकरण संभव होगा। विभागीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में भी गति आएगी।
प्रदेश में अभी तक मुख्यमंत्री के पास 35 से अधिक विभागों का जिम्मा है। जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद ग्रहण किया था, उस समय उनके पास 23 विभाग थे। इसके बाद मंत्री चंदन राम दास के निधन और मंत्री प्रेमचंद्र अग्रवाल के इस्तीफे के बाद उनके विभाग भी मुख्यमंत्री के पास आ गए थे। मुख्यमंत्री के पास अत्याधिक विभागों का बोझ पडऩे के कारण नीतिगत कार्यों में निर्णय प्रक्रिया और योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पडऩे की आशंका बनी रहती थी।
वहीं, सीमित संख्या में मंत्रियों के कारण कई विभाग सीधे मुख्यमंत्री के अधीन थे, जिससे कार्यों का केंद्रीकरण बढ़ गया था। मंत्रिमंडल का विस्तार होने के साथ ही अब विभिन्न विभागों का बंटवारा नए मंत्रियों के बीच किया जाना है। इससे कार्यों का विकेंद्रीकरण संभव होगा। विभागीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी और योजनाओं के क्रियान्वयन में भी गति आएगी।
मंत्रियों की संख्या व विभागीय बंटवारे से नीतिगत फैसलों में तेजी आएगी। साथ ही, जमीनी स्तर पर विकास योजनाओं की निगरानी भी बेहतर तरीके से हो सकेगी। इस समय राज्य में बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन से जुड़े कई बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं। इन पर सतत निगरानी जरूरी है। मंत्रिमंडल विस्तार से निश्चित रूप से आने वाले समय में विकास कार्यों में तेजी देखने को मिल सकती है।


