वाराणसी के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अभियुक्त महेश उर्फ मुन्ना यादव की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखा है।
न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह (प्रथम) की खंडपीठ ने वाराणसी सत्र न्यायालय द्वारा 27 जून 2016 को सुनाए गए उस फैसले की पुष्टि की, जिसमें अपीलार्थी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और आर्म्स एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया था।
घटना 16 मार्च 2014 की रात हुई थी। भेलूपुर थाना क्षेत्र के महमूरगंज इलाके में भूमि विवाद को लेकर हुई गोलीबारी में भोला यादव और विनोद यादव नामक व्यक्तियों की मृत्यु हो गई थी।
अभियोजन कथानक के अनुसार, रात करीब 10:30 बजे अभियुक्त अपने साथियों के साथ भोला यादव के घर पहुंचा और जमीन के विवाद को लेकर गाली-गलौज करने लगा। विरोध किए जाने पर सह-अभियुक्तों के उकसाने पर महेश उर्फ मुन्ना यादव ने पिस्टल से अंधाधुंध फायरिंग कर दी।
भोला यादव और बीच-बचाव करने आए विनोद यादव को गंभीर चोटें आईं और अस्पताल में उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस ने एफआइआर दर्ज की और अगले दिन अभियुक्त के पास से हत्या में प्रयुक्त पिस्टल और कारतूस बरामद किया।
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि चश्मदीद गवाह जो मृतक के परिजन थे वह अपने बयानों से मुकर गए हैं और उन्हें होस्टाइल घोषित किया गया है। दोनों मृतकों के शरीर पर मिले घावों के आकार अलग-अलग थे और अलग-अलग हथियारों के इस्तेमाल की ओर इशारा करते हैं।
खंडपीठ ने इन तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल गवाहों के मुकर जाने से पूरा मामला खत्म नहीं हो जाता, यदि अन्य साक्ष्य विश्वसनीय हों।न्यायालय ने फारेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट पर भरोसा जताया, जिसने पुष्टि की थी कि मौके से बरामद खाली कारतूस अभियुक्त से जब्त किए पिस्टल से ही चलाए गए थे।
खंडपीठ ने कहा, घटना के तुरंत बाद दर्ज कराई गई एफआइआर किसी भी तरह की साजिश की संभावना खत्म करती है। साथ ही पुलिस को देख कर अभियुक्त के भागने का प्रयास करना और उसके पास से हथियार की बरामदगी भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा आठ के तहत मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्य है।
भूमि विवाद के रूप में हत्या का मकसद पूरी तरह स्थापित था। इन तथ्यों और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने अपील को मेरिटहीन मानते हुए खारिज कर दिया और आदेश दिया कि अभियुक्त जेल में अपनी शेष सजा काटता रहेगा।


