साहित्यिक राजधानी कहा गया था इलाहाबाद (अब प्रयागराज) को। इसकी वजह भी है। रचनाकारों ने ऐसे-ऐसे साहित्य रचे जिनमें शब्द-शिल्प ने देश और दुनिया को दिखाया कि यहां समाज को करीब से देखने-समझने और उसे कलम के जरिये दिशा देने वालों की फसल उगती है।
एक-दो फूल नहीं, साहित्यकारों की यहां पूरी बगिया ही लहलहाई। उन्हीं में एक सक्षम और सक्रिय लेखिका ममता कालिया आज भी साहित्य के आकाश में सितारे की तरह चमक रही हैं। उन्हें इस शहर में लंबी अवधि तक रहने के दौरान मिले अनुभव पर आधारित कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ पर 2025 का साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया है।
इसे साहित्यिक अवदान तथा सम्मान पाने की गौरवशाली परंपरा ही कहेंगे कि साहित्य अकादमी की ओर से तीन साल में ही एक बार फिर प्रयागराज की झोली में पुरस्कार आया। 2023 में यहां की प्रो. नीलम शरन गौड़ को उनके अंग्रेजी उपन्यास ‘रेक्विम इन राग जानकी’ के लिए अंग्रेजी भाषा का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
ममता और उनके पति वरिष्ठ साहित्यकार रवींद्र कालिया करीब तीन दशक तक प्रयागराज में रहे। ममता ने यहां महिला सेवा सदन डिग्री कालेज में अध्यापन भी किया था। 1970 से 2000 तक यहां रहीं ममता ने सक्रिय लेखन किया। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जीते जी इलाहाबाद’ में इसका प्रमुखता से जिक्र किया है।
दो नवंबर 1940 को वृंदावन में जन्मीं ममता कालिया ने नाटक, उपन्यास, निबंध, कविताएं भी लिखीं। संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ का प्रकाशन 2021 में में हुआ और 28 दिन में ही किताब का दूसरा संस्करण आ गया। अब तक पुस्तक के चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।
इससे पहले इन्हें मिले पुरस्कार
| लेखक का नाम | वर्ष | कृति का नाम | कृति का प्रकार |
| सुमित्रानन्दन पंत | 1960 | कला और बूढ़ा चांद | कविता संग्रह |
| हरिवंश राय बच्चन | 1968 | दो चट्टानें | कविता संग्रह |
| सर्वेश्वर दयाल सक्सेना | 1983 | खूंटियों पर टंगे लोग | कविता संग्रह |
| नरेश मेहता | 1988 | अरण्या | कविता संग्रह |
| अमरकांत | 2007 | इन्हीं हथियारों से | उपन्यास |
| नासिरा शर्मा | 2016 | पारिजात | उपन्यास |
| बद्रीनारायण | 2022 | तुमड़ी के शब्द | कविता संग्रह |


