बिहार की राजनीति में हलचल उस समय और तेज हो गई, जब भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के भाजपा में विलय का प्रस्ताव सामने रखा। इस प्रस्ताव को अब राज्यसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे पूरे घटनाक्रम को नई राजनीतिक गंभीरता मिल गई है।
रालोमो प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा का राज्यसभा कार्यकाल समाप्ति की ओर है और पांच मार्च को नामांकन की अंतिम तिथि है। ऐसे में समय की संवेदनशीलता इस प्रस्ताव को और अहम बना देती है।
राज्यसभा भेजे जा सकते हैं उपेंद्र कुशवाहा
सियासी सूत्रों के अनुसार भाजपा की ओर से यह संकेत दिया गया है कि यदि रालोमो का भाजपा में विलय होता है, तो कुशवाहा को राज्यसभा भेजने में सहयोग किया जा सकता है। यही बिंदु इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बनकर उभरा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा एक तीर से 2 निशाने साधने की रणनीति पर काम कर रही है। एक ओर वह राज्यसभा की सीट पर अपने भरोसेमंद सहयोगी को भेजकर सदन में संख्या संतुलन मजबूत करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर रालोमो के सामाजिक आधार विशेषकर पिछड़े वर्गों को सीधे अपने संगठन में समाहित करना चाहती है।
हालांकि यह राह आसान नहीं दिखती। उपेन्द्र कुशवाहा ने जदयू छोड़ने के दौरान सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे गठबंधन कर सकते हैं, लेकिन भाजपा की सदस्यता स्वीकार नहीं करेंगे।
उनका यह बयान आज भी राजनीतिक चर्चाओं में उद्धृत किया जाता है। ऐसे में यदि वे विलय के प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं तो विपक्ष इसे उनके पुराने रुख से जोड़कर सवाल उठा सकता है।
राज्यसभा में वापसी पर हो सकता है संकट
दूसरी तरफ, यदि कुशवाहा प्रस्ताव ठुकराते हैं तो राज्यसभा में उनकी वापसी को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है। पांच मार्च की नामांकन तिथि नजदीक होने से राजनीतिक दबाव और भी बढ़ गया है।
यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल दलों के विलय के प्रस्ताव के रूप में नहीं, बल्कि राज्यसभा चुनाव से जुड़ी रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है।


