सिंगरौली में पेड़ कटाई के आंकड़ों पर घमासान: 6 हजार, 33 हजार या 5 लाख? विधानसभा में गरमाई बहस

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सिंगरौली। जिले के बासीबृंदहा क्षेत्र में कथित बड़े पैमाने पर पेड़ कटाई का मामला अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है। मध्य प्रदेश विधानसभा में इस मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। पेड़ों की संख्या को लेकर सरकार के जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों के अलग-अलग आंकड़ों ने पूरे मामले को और उलझा दिया है।

विधानसभा में देवसर विधायक ने कहा कि सिंगरौली में केवल 6,000 पेड़ों की कटाई हुई है। वहीं कुछ महीने पूर्व मध्य प्रदेश सरकार की मंत्री एवं सिंगरौली जिले की प्रभारी मंत्री ने पेड़ों की संख्या 33,000 बताई थी। इन परस्पर विरोधी आंकड़ों ने विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का मौका दे दिया।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ने इस मुद्दे पर कड़ा विरोध जताया है। चर्चा का विषय है कि यदि सरकार के मंत्री और विधायक ही सटीक आंकड़े तय नहीं कर पा रहे हैं तो वास्तविक स्थिति क्या है, यह गंभीर जांच का विषय है। कथित आरोप है कि जमीनी हकीकत और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में लगभग 5 लाख से अधिक पेड़ कटने की बात सामने आई है, जो बेहद चिंताजनक है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई। हालात बिगड़ते देख मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने मामले को शांत कराने का प्रयास किया।

आदिवासी आजीविका पर असर

बासीबृंदहा क्षेत्र में बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार निवास करते हैं, जिनकी आजीविका जंगलों पर निर्भर रही है। यहां तेंदू, महुआ और अन्य वन उत्पादों के सहारे लोग जीवन यापन करते थे। तेंदू पत्तों से बीड़ी निर्माण और महुआ से जुड़े कार्य स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि पेड़ों की कटाई से न केवल पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ है, बल्कि हजारों परिवारों के रोजगार पर भी संकट खड़ा हो गया है। उनका कहना है कि कंपनी द्वारा की गई कटाई से उनकी पारंपरिक आजीविका के रास्ते बंद हो गए हैं और अब वे दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

पर्यावरण और वन्यजीवों पर प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर वन कटाई से जैव विविधता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, जंगलों के घटने से जंगली जानवर अब रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका बढ़ गई है।

सबसे बड़ा सवाल: आंकड़ों में अंतर क्यों?

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जब पेड़ कटाई जैसी गंभीर घटना हुई है, तो सरकार के जिम्मेदार मंत्री और विधायक अलग-अलग आंकड़े क्यों दे रहे हैं? क्या वास्तविक संख्या छुपाई जा रही है, या विभागीय समन्वय की कमी है? विपक्ष ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, जबकि सरकार की ओर से अब तक विस्तृत आधिकारिक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।

बासीबृंदहा की पेड़ कटाई का मामला अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में इस पर सरकार की अगली कार्रवाई और जांच रिपोर्ट पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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