क्षारीय भूमि की बढ़ती समस्या से जूझ रहे किसानों के लिए केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआइ) का नया नवाचार बड़ी राहत लेकर आया है। संस्थान के विज्ञानियों द्वारा विकसित मिश्रण क्षारीय जमीन के सुधार में 70 प्रतिशत तक जिप्सम पर निर्भरता कम कर सकता है।
इससे किसानों की लागत घटेगी और सीमित उपलब्धता की समस्या से भी निजात मिलेगी। हरियाणा लैंड रीक्लेमेशन एंड डेवलपमेंट कार्पोरेशन की रिपोर्ट के अनुसार भूमि सुधार योजनाओं में प्रति वर्ष करीब 36 हजार मीट्रिक टन जिप्सम की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन अनुदान आधारित आपूर्ति एक वर्ष से प्रभावित है, जिससे किसान परेशान हैं। ऐसे में यह नवाचार सस्ता और टिकाऊ विकल्प बनकर उभरा है।
इस फार्मूले की खासियत यह है कि इसमें रिफाइनरी, थर्मल प्लांटों की राख और शहरी ठोस अपशिष्ट का उपयोग किया गया है। इससे एक ओर औद्योगिक और शहरी कचरे के निस्तारण की समस्या का समाधान होगा, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आएगी। जो अपशिष्ट अब तक पर्यावरण के लिए चुनौती बने थे, वही अब भूमि की सेहत सुधारने में सहायक बनेंगे।
क्षारीय भूमि में सोडियम की अधिकता के कारण फसल उत्पादन प्रभावित होता है। नया मिश्रण मिट्टी की संरचना को संतुलित कर उसकी उर्वरता बढ़ाने में सहायक है। इससे फसल उत्पादन बेहतर होगा और रासायनिक उर्वरक व कीटनाशकों पर निर्भरता घटेगी। परिणामस्वरूप किसानों की आय में वृद्धि और खेती की लागत में कमी संभव होगी।
सीएसएसआरआइ के विज्ञानियों ने रिफाइनरी से निकलने वाले सल्फर, नेशनल थर्मल पावर स्टेशन (एनटीपीसी) से निकलने वाले फ्ल्यू गैस डी-सल्फराइजेशन (एफजीडी) जिप्सम और शहरी ठोस अपशिष्ट से बने कंपोस्ट को मानकों के अनुसार मिलाकर एक प्रभावी मिश्रण तैयार किया है।
खेतों में किए गए प्रयोगों में यह फार्मूला जिप्सम जितना ही प्रभावी साबित हुआ है। सल्फर और एफजीडी में मौजूद कैल्शियम मिट्टी में जमा हानिकारक सोडियम को हटाने में मदद करता है, जबकि म्यूनिसिपल वेस्ट से तैयार कंपोस्ट मिट्टी की जैविक गुणवत्ता को सुधारता है।


