जिले के किसानों को नलकूप बिजली बिलों में किए गए घपले का खामियाजा तीन दशकों से भुगतना पड़ रहा है। पावर कॉरपोरेशन के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा करोड़ों रुपये वसूलने के बाद किसानों को फर्जी रसीदें थमा दी गईं। यही नहीं, बिलबुक पर भी गलत प्रविष्टियां कर दी गईं। जब यह घोटाला सामने आया था, तब इसकी राशि लगभग 220 करोड़ रुपये थी और जिले के करीब 20 हजार किसान इसके शिकार बने थे।
घोटाले की शुरुआत
करीब 30 साल पहले किसानों से नलकूप बिजली बिलों के नाम पर करोड़ों रुपये वसूले गए। लेकिन वास्तविक भुगतान दर्ज करने के बजाय अधिकारियों ने फर्जी रसीदें जारी कर दीं। बिलबुक में भी गलत एंट्री कर दी गई, जिससे किसानों के खातों में बकाया दिखने लगा। उस समय यह घोटाला 220 करोड़ रुपये का था।
ब्याज ने बढ़ाई परेशानी
समस्या का समाधान निकालने के बजाय पावर कॉरपोरेशन ने किसानों के खातों पर चक्रवर्ती ब्याज लगाना शुरू कर दिया। इसके चलते घोटाले की राशि लगातार बढ़ती रही। स्थिति यह है कि आज भी किसानों के खातों में लाखों रुपये की देनदारी गलत तरीके से जुड़कर भेजी जा रही है।
किसानों की पीड़ा
जिले के हजारों किसान इस घोटाले से प्रभावित हैं। उनका कहना है कि वे पहले ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और ऊपर से बिजली बिलों की गलत देनदारी ने उनकी परेशानियां और बढ़ा दी हैं। किसान नेताओं का कहना है कि यह घोटाला किसानों की मेहनत और जीवन पर सीधा प्रहार है।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
किसानों और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाया है कि इतने बड़े घोटाले के बावजूद प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया। उनका कहना है कि यदि समय रहते जांच और कार्रवाई की जाती, तो किसानों को 30 साल तक इस गलत देनदारी का बोझ नहीं उठाना पड़ता।
समाधान की मांग
किसानों ने मांग की है कि सरकार और पावर कॉरपोरेशन इस घोटाले की पूरी जांच कराए और किसानों के खातों से गलत देनदारियां हटाई जाएं। साथ ही दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। किसानों का कहना है कि जब तक यह समस्या हल नहीं होगी, तब तक वे न्याय के लिए आंदोलन जारी रखेंगे।
निष्कर्ष
नलकूप बिजली बिल घोटाला जिले के किसानों के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है। 20 हजार से अधिक किसान इस घोटाले से प्रभावित हैं और 30 साल से गलत देनदारी का बोझ ढो रहे हैं। यदि प्रशासन ने जल्द कदम नहीं उठाए, तो किसानों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है। यह मामला न केवल किसानों की आजीविका से जुड़ा है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।


