जलवायु परिवर्तन अब दुनिया की वास्तविकता बन चुकी है और इसके असर से मुंह फेरना नामुमकिन है। बढ़ता तापमान और बदलते मौसम पैटर्न से यह साफ देखा जा सकता है। देर से दस्तक देती ठंड, पहाड़ों पर पिघलती बर्फ और समुद्र का बढ़ता जलस्तर आगामी आपदाओं के संकेत दे रहे हैं।
इसी कड़ी में हिंदू-कुश हिमालय का ताजा डेटा सामने आया है, जिसने एक बार फिर क्लाइमेट चेंज की गंभीरता पर मुहर लगा दी है। इंटरनेशनल सेंटर ऑफ इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने इस पर्वत क्षेत्र का सैटेलाइट डेटा जारी किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में इस वर्ष हिमालय पर सबसे कम बर्फबारी दर्ज की गई है। पिछले 23 सालों में यह स्नो सीजन अब तक का सबसे कम रहा है। ICIMOD के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हिमालय में बर्फ की यह कमी क्षेत्रीय जल संसाधनों और नदियों के प्रवाह पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय में बर्फ की कमी न केवल ग्लेशियरों के पिघलने की दर को बढ़ाएगी, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं की संभावना भी बढ़ा सकती है। इसके साथ ही यह प्रभाव स्थानीय कृषि और जल आपूर्ति प्रणाली पर भी पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन के इस संकेत ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को सतर्क कर दिया है। ICIMOD ने हिमालयी क्षेत्रों में सतत पर्यावरण संरक्षण और ग्लेशियर निगरानी को प्राथमिकता देने की सलाह दी है।

