गोरबी कांटा से साइडिंग तक ‘ग्रेड गेम’? 25 रुपये प्रति टन कमीशन की चर्चा

सिंगरौली। कोयला उत्पादन के लिए देशभर में चर्चित एनसीएल (नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) के गोरबी ब्लॉक-बी परियोजना से जुड़ा एक कथित मामला सामने आया है, जिसने खनन क्षेत्र में पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि परियोजना के कोयला कांटा (वेटब्रिज) और डिस्पैच व्यवस्था के स्तर पर कोयले के ग्रेड में हेरफेर कर आर्थिक लाभ कमाया जा रहा है।

चुरा बनाम स्टीम कोयला: क्या हो रहा है खेल?

सूत्रों का दावा है कि परियोजना से निकलने वाले चुरा (फाइन्स) कोयले की जगह कथित तौर पर स्टीम कोयला लोडिंग के बाद बाहर निकाला जा रहा है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो इससे ग्रेड और मूल्य में अंतर के कारण राजस्व की बड़ी हानि हो रही है। जानकारों के मुताबिक, कोयले का ग्रेड और उसकी श्रेणी ही कीमत तय करती है। ऐसे में ग्रेड में किसी भी प्रकार का फेरबदल बड़े वित्तीय अंतर का कारण बन सकता है।

डिस्पैच अधिकारी और कांटा बाबू की भूमिका पर सवाल

स्थानीय सूत्रों ने आरोप लगाया है कि इस कथित खेल में डिस्पैच अधिकारी और कांटा बाबू की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप है कि चुरा कोयले की जगह स्टीम कोयला निकलवाने के एवज में लगभग ₹25 प्रति टन “लायजनिंग” के नाम पर कमीशन वसूला जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की संबंधित अधिकारियों की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

देव ट्रेडिंग और अन्य कंपनियों का नाम चर्चा में

सूत्रों के अनुसार, देव ट्रेडिंग नामक कंपनी द्वारा कोयले की लोडिंग कराई जा रही है और उक्त कोयले को मोरवा साइडिंग तक पहुंचाया जाता है। यह भी दावा किया जा रहा है कि इस कथित प्रक्रिया में केवल एक ट्रांसपोर्ट कंपनी नहीं, बल्कि अन्य कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं। यदि यह आरोप सही सिद्ध होते हैं तो मामला केवल परियोजना स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी सप्लाई चेन की जांच की आवश्यकता होगी।

विजिलेंस विभाग की भूमिका पर भी उठे सवाल

एनसीएल में आंतरिक निगरानी के लिए विजिलेंस विभाग मौजूद है, जिसका दायित्व अनियमितताओं पर रोक लगाना है। लेकिन स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि विजिलेंस की सक्रियता अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं दे रही। यहां प्रश्न उठता है कि यदि इतनी बड़ी मात्रा में कथित रूप से ग्रेड हेरफेर हो रहा है तो क्या निगरानी तंत्र प्रभावी है? क्या नियमित ऑडिट और आकस्मिक जांच पर्याप्त हैं?

अब देखना यह है कि समाचार सार्वजनिक होने के बाद संबंधित प्रबंधन और विजिलेंस विभाग इस पर क्या रुख अपनाते हैं क्या कथित खेल पर लगाम लगेगी या यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा?

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