यही तो ब्रज की विशेषता है। यहां तो अपने आराध्य से भी भाव का रिश्ता है। भगवान कृष्ण कहीं द्वारकाधीश हैं, तो कहीं बांकेबिहारी के रूप में दर्शन दे रहे हैं। लेकिन उनकी क्रीड़ास्थली गोकुल में तो आज भी वह सबके लिए बालक कान्हा हैं। फिर होली भी उसी कान्हा के भाव के साथ हुई।
होली के उल्लास में डूबा गोकुल
गोकुल में रविवार को छड़ीमार होली का उल्लास छाया। सजी धजी गोकुल की हुरियारिन में कान्हा के स्वरूप पर छड़ी बरसाई तो हर ओर जय कन्हैयालाल की गूंज उठा। होली खेलने से पहले हुरियारिन केसर दूध पीकर दोपहर छड़ीमार होली खेलने को तैयार हूं। दोपहर बजे से होली की उत्सव शुरू हुआ।
नंदभवन मंदिर से निकला डोला
नंदभवन मंदिर से ठाकुर जी डोला निकला और फिर आगे कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम के स्वरूप चले। यहां पहले उनकी आरती उतारी और फिर सजी-धजी हुरियारिन ने छड़ी मार होली खेली। हजारों श्रद्धालु इस अद्भुत होली के साक्षी बने।


