पुलिस की लापरवाही ने एक निर्दोष किसान की जिंदगी के 12 साल छीन लिए। बेगुनाह होते हुए भी किसान को अपराधी की तरह जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ा। लगातार पुलिस दबिश, गिरफ्तारी का डर और सामाजिक अपमान के बीच उसने एक दशक से अधिक समय गुजार दिया। अदालत के फैसले के बाद भले ही उसे न्याय मिल गया हो, लेकिन बीते 12 वर्षों का दर्द और अपमान आज भी उसके चेहरे पर साफ झलकता है।
मामला 73 वर्षीय किसान तुहीराम से जुड़ा है, जिन्हें पुलिस की कथित लापरवाही के चलते बिजली चोरी के एक मामले में आरोपी बना दिया गया। इस दौरान पुलिस उनके घर पर बार-बार दबिश देती रही। गिरफ्तारी से बचने के लिए तुहीराम को कभी पड़ोसियों तो कभी रिश्तेदारों के घर छिपकर रहना पड़ा। इस लंबी कानूनी लड़ाई ने न केवल उन्हें मानसिक रूप से तोड़ा, बल्कि समाज में उनकी प्रतिष्ठा को भी गहरी ठेस पहुंचाई।
अदालत द्वारा निर्दोष करार दिए जाने के बाद तुहीराम के चेहरे पर राहत और खुशी साफ दिखाई दे रही है, लेकिन साथ ही उन पुलिसकर्मियों के प्रति आक्रोश भी है, जिनकी लापरवाही के कारण उन्हें यह सब झेलना पड़ा। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर पुलिस ने शुरुआत में ही सावधानी और जिम्मेदारी से जांच की होती, तो उन्हें बेवजह परेशान नहीं होना पड़ता।
तुहीराम का कहना है कि पुलिस की गलती के कारण उनके माथे पर बिजली चोरी जैसा कलंक लगा, जिसने उनकी सामाजिक छवि को नुकसान पहुंचाया। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर वह लापरवाह पुलिसकर्मियों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे और अपने अपमान व सामाजिक प्रतिष्ठा को हुए नुकसान का हिसाब मांगेंगे।
यह मामला एक बार फिर पुलिस जांच प्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जहां एक छोटी सी लापरवाही किसी निर्दोष व्यक्ति की पूरी जिंदगी को प्रभावित कर सकती है।

