‘खराब चाय’ की दुकान पर रोजाना 15 लीटर दूध की खपत, जो एक बार पी लेता है वो आदी हो जाता है… आखिर क्यों?

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स्वागत संग शिष्टाचार बन चुकी चाय आज विविध रूपों में लुभाने लगी है। बहुरंगी चाय के गुण और नाम भी अनेकों हैं। चाय से बात की शुरूआत की पेशकस आमबात हो चुकी है। अब लोगों की दिनचर्या में चाय बस चुकी है।

हर गली, नुक्कड़, रेलवे स्टेशन से लेकर कार्पोरेट दफ्तरों तक चाय की खुशबू फैल चुकी है। ऐसे में हमें कटेहरी बाजार के पश्चिमी छोर पर अयोध्या-बसखारी हाइवे के गौरा बसंतपुर गांव के निकट खराब चाय वाला की याद आती है।

खराब चाय के नाम से तीन वर्ष से मशहूर दुकान पर यहां से गुजरने वाले हर किसी की नजर संग उसके कदम भी ठहर जाते हैं। खराब चाय वाला की दुकान पर लोग अच्छी चाय पीने पहुंचते हैं। दुकान का बोर्ड देखकर पहले तो लोग आश्चर्य करते हैं,लेकिन बाद में यहां रुककर चाय का स्वाद लेते हैं।

गौरा बसंतपुर के राजेश कुमार पहले पान की गुमटी चलाते थे। गत तीन वर्ष पहले उन्होंने चाय की दुकान खोली। वह बताते हैं कि अक्सर दुकानों पर लोग स्वादिष्ट, जायकेदार, मैत्री चाय आदि विभिन्न नामों के बोर्ड दिखते हैं। ऐसे में मेरे मन में खराब चाय का बोर्ड लगाने की सूझी सो लगा दिया।

बताते हैं कि प्रतिदिन करीब 15 लीटर दूध की खपत होती है और इतने में डेढ़ से दो सौ चाय बनती हैं। दूध, चीनी, चाय पत्ती, अदरक, गैस, इलायची, लौंग, कालीमिर्च आदि का खर्चा निकालने के बाद प्रतिदिन चार से पांच सौ रुपये तक की बचत हो जाती है।

राजेश कुमार कहते हैं कि एक बार यहां चाय पीने के बाद लोग दोबारा चाय पीने अवश्य आते हैं। राजेश कहते हैं कि चाय स्वाद से ज्यादा, एक आदत भी बन चुकी है।

सुबह की शुरुआत हो या शाम की थकान चाय हर भाव का साथी है। यह सिर्फ एक पेय ही नहीं,बल्कि लोगों को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सेतु बन चुकी है। गपशप के साथ यहां अहम मुद्दों पर छिड़ी जुबानी जंग में चाय सबका साथ देती है।

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