इजरायल चुनाव में किसी को बहुमत नहीं… इस राजनीतिक गतिरोध का भारत, ईरान और गाजा पर क्या होगा असर?

1790 Shares

 इजरायल में चुनाव के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। नतीजा यह है कि दोनों ही मुख्य पार्टी लिकुड और यशर को तीसरी अरब पार्टियों के साथ मिलकर ही सत्ता में पहुंचने का रास्ता बनता दिख रहा है।

अरब पार्टियों की सीटों में बढ़ोतरी का असर साफ दिख रहा है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू के नेतृत्व वाली लिकुड और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट की विपक्षी पार्टी यशर सत्ता में आने से दूर रह गई हैं। नेतन्याहू की पार्टी को 53 और गादी की पार्टी को 48 सीटें मिली हैं। वहीं अरब पार्टियों को इस बार 19 सीटें मिली हैं।

काम नहीं आई नेतन्याहू की अपील

नेतन्याहू ने मतदाताओं से अपील की थी कि वे उन्हें देश को मुश्किल हालात से निकालने वाले नेता के तौर पर वोट दे। हालांकि वोटरों पर इस तरह की अपील का प्रभाव नहीं दिखा। नतीजा यह हुआ कि उनके गुट की सीटें 68 से घटकर 53 रह गईं। बता दें कि मतदान प्रतिशत लगभग 78 फीसदी रहा। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान और ईरान में हुए युद्धों के बाद यह पहला राष्ट्रीय चुनाव है।

गाजा और ईरान पर क्या होगा असर

इजरायल और ईरान के बीच अभी भी गतिरोध जारी है। गाजा का भविष्य अनिश्चित है। लेबनान में तनाव है, और वेस्ट बैंक में भी हालात ठीक नहीं हैं। कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि सत्ता बदल भी जाए तो नीति बदलेगी या नहीं ये अभी तय नहीं हो सकता है।

हां यह जरूर है कि नेतन्याहू कमजोर जरूर हुए हैं लेकिन अभी भी रेस में आगे हैं। अगर सरकार बनाने का दावा होगा तो राष्ट्रपति को पहले उन्हें ही मौका देना होगा। उनके पीएम बनते ही फिर से इजरायल अपनी पुरानी नीति पर तेजी से आगे बढ़ेगा। वहीं, आइसेनकोट ईरान और हमास के प्रति सख्त रुख रखते हैं। वे फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन का भी विरोध करते हैं।

भारत के लिए क्यों है अहम

भारत-इजरायल के संबंध अब केवल हथियार खरीदने तक सीमित नहीं हैं। इसमें अब संयुक्त उत्पादन, तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, खेती, जल प्रबंधन, अंतरिक्ष और व्यापार जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। पीएम मोदी और नेतन्याहू की दोस्ती भी कई बार वैश्विक मंच पर सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

दोनों देशों के लिए रक्षा समझौता अहम

दोनों ही रक्षा समझौते को काफी महत्व देते हैं। नवंबर 2025 में ही दोनों देशों ने रक्षा सहयोग के लिए एक समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम) पर हस्ताक्षर किया था। इसलिए ऐसा माना जा रहा है कि सत्ता के बदलने से दिल्ली और यरुशलम के बीच रिश्ते नहीं बदलेंगे।

अगर आइसेनकोट की सरकार आती है, तो उनकी प्राथमिकता यूरोप के साथ बेहतर संबंध हो सकती है। ऐसे हालात में केंद्र सरकार के लिए ये चुनौती होगी कि वह बिना किसी रुकावट के नए नेताओं के साथ बेहतर तालमेल बिठाएं। इसके साथ ही भारत सरकार के लिए यह भी चुनौती कम नहीं होगी कि अरब देशों और ईरान के साथ अपने पुराने रिश्ते को दरकिनार ना करते हुए इजरायल की नई सरकार के साथ भी गहरे संबंध स्थापित करे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *