‘रातां लंबियां कालियां नी समिए’… लव सॉन्ग नहीं, इस पंजाबी लोकगीत में छिपी है मां-बेटी के दर्द की कहानी

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इंटरनेट पर आजकल एक पंजाबी गाना बहुत ट्रेंड कर रहा है। आपने भी इसे कोक स्टूडियो या इंस्टाग्राम रील्स पर जरूर सुना होगा- ‘सम्मी मेरी वार’। इसके रूहानी संगीत को सुनकर हर किसी को यही लगता है कि यह कोई रोमांटिक गाना है, जहां कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की याद में तड़प रहा है। हालांकि, सच्चाई इससे बिल्कुल जुदा है।

जी हां, यह कोई लव सॉन्ग नहीं है, बल्कि एक ऐसी मां की दर्दभरी पुकार है, जिसकी जवान बेटी को एक पेड़ बचाने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। आइए जानते हैं इस गाने के पीछे की वह असली कहानी, जो आज भी रेगिस्तान में बादलों को रुला देती है।

पेड़ से लिपट गई थी ‘सम्मी’

कहा जाता है कि पुराने पंजाब के ‘सैंडल बार’ इलाके में सम्मी नाम की एक बेहद खूबसूरत और बहादुर लड़की रहा करती थी। उस गांव की प्रकृति से उसे गहरा लगाव था। एक बार वहां के राजा ने अपनी रानी के लिए एक आलीशान महल बनाने का फैसला किया।

महल के निर्माण के लिए लकड़ियों की जरूरत थी, तो राजा ने अपने सैनिकों को गांव का एक विशाल और पुराना पेड़ काटने का हुक्म दिया। हालांकि, सम्मी और गांव वाले किसी भी कीमत पर उस पेड़ को कटने नहीं देना चाहते थे। जब सैनिक कुल्हाड़ियां लेकर पहुंचे, तो सम्मी उस पेड़ के सामने डटकर खड़ी हो गई। उसने सैनिकों से साफ कह दिया, “अगर इस पेड़ को काटना है, तो उससे पहले तुम्हें मुझे काटना होगा।”

राजा के सैनिकों ने जरा भी रहम नहीं खाया। उन्होंने राजा के आदेश का पालन करते हुए पहले सम्मी की जान ले ली और फिर उस पेड़ को काट डाला।

लव सॉन्ग नहीं, एक मां की है दर्दनाक पुकार

जब सम्मी की मां को अपनी बेटी की इस खौफनाक मौत के बारे में पता चला, तो वह पूरी तरह टूट गई। वह अपनी सुध-बुध खो बैठी और अपनी बेटी को पुकारते हुए सैंडल बार और चोलिस्तान के रेगिस्तानों में पागलों की तरह भटकने लगी।

उसी दर्द, उसी तड़प और उसी आंसुओं के बीच इस लोकगीत का जन्म हुआ। जब गाने में वह लाइन आती है:

“रातां लंबियां कालियां नी समिए…”

तो यह कोई आशिक नहीं गा रहा है। यह एक सूनी हो चुकी मां की पुकार है, जो अपनी बेटी से कह रही है- “ऐ सम्मी… तुम्हारे बिना मेरी ये रातें कितनी लंबी और कितनी काली हो गई हैं।” उसे अपनी बेटी के बिना हर रात एक पहाड़ जैसी लगने लगी थी।

दर्द इतना गहरा कि बादल भी रो पड़ते हैं

इस पंजाबी लोकगीत में एक मां के जज्बात इतने गहरे और सच्चे हैं कि इसे सुनकर पत्थर दिल भी पिघल जाए। सैंडल बार और चोलिस्तान के इलाकों में आज भी इसे लेकर एक बेहद खास मान्यता है।

दरअसल, जब वहां लंबे समय तक सूखा पड़ता है और बारिश नहीं होती, तो वहां के स्थानीय लोग इकट्ठा होकर ‘सम्मी मेरी वार’ गाते हैं। उनका मानना है कि इस गाने में एक मां का इतना भयानक दर्द छिपा है कि जब इसे गाया जाता है, तो बादल भी उस मां का दर्द महसूस करके रो पड़ते हैं और रेगिस्तान में झमाझम बारिश होने लगती है।

प्रकृति के लिए जान देने वाली बेटी की गाथा

इंटरनेट पर आज युवा पीढ़ी इस गाने को खूब सुन रही है, जो कि हमारी संस्कृति के लिए बहुत अच्छी बात है। लोकगीतों को ऐसे ही जिंदा रखा जाता है। हालांकि, अगली बार जब आप अपनी कार में या इयरफोन लगाकर ‘सम्मी मेरी वार’ सुनें, तो याद रखिएगा कि आप किसी आशिक का गीत नहीं, बल्कि प्रकृति के लिए जान देने वाली एक बहादुर बेटी का बलिदान और एक मां का दर्द सुन रहे हैं।

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