राजस्थान की राजधानी जयपुर में बालश्रम का एक गंभीर मामला सामने आया है। यहां चूड़ी बनाने के काम में 12 से 15 साल तक के बच्चों को लगाए जाने का आरोप है। दावा है कि बिहार से बच्चों को जयपुर लाकर छोटे-छोटे कमरों में रखा जाता है और उनसे रोजाना 12 से 16 घंटे तक काम कराया जाता है। इसके बदले उन्हें महज 200 रुपए दिहाड़ी मिलने की बात सामने आई है। लगातार लंबे समय तक हाथों से काम करने के कारण कुछ बच्चों की अंगुलियां तक टेढ़ी होने की जानकारी मिली है।
इस मामले की पड़ताल के दौरान एक टीम जयपुर के उन इलाकों तक पहुंची, जहां कथित तौर पर बच्चों से छिपाकर मजदूरी कराई जा रही थी। करीब 15 दिनों तक की गई जांच के बाद भट्टा बस्ती इलाके में एक तीन मंजिला मकान के भीतर चार नाबालिग चूड़ियां बनाते मिले। इनमें से तीन बच्चों की उम्र महज 12 साल बताई गई। कमरे की स्थिति और बच्चों की काम करने की परिस्थितियों ने बालश्रम से जुड़े गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
छोटे कमरे में काम करते मिले चार बच्चे
पड़ताल के दौरान टीम भट्टा बस्ती स्थित एक तीन मंजिला इमारत में पहुंची। दूसरी मंजिल पर जाने के बाद एक कमरे से बच्चों के बातचीत करने की आवाज सुनाई दी। दरवाजा खटखटाने पर एक बच्चे ने दरवाजा खोला।
अंदर करीब 10 गुणा 10 फीट का छोटा कमरा था। वहां चार बच्चे अलग-अलग छोटी टेबलों पर बैठकर चूड़ियां बनाने का काम कर रहे थे। बच्चों की उम्र लगभग 12 से 15 साल के बीच बताई गई। कमरे में एक तरफ उनके कपड़े टंगे हुए थे, जबकि आसपास चूड़ियों में इस्तेमाल होने वाले रंग, पॉलिश और केमिकल से जुड़ी गंदगी फैली हुई थी।
यह दृश्य बच्चों के रहने और काम करने की परिस्थितियों पर सवाल उठाता है। इतनी कम उम्र में शिक्षा और खेलकूद के बजाय लंबे समय तक काम करने की मजबूरी उनके शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती है।
25 बंडल बनाने का लक्ष्य, दिहाड़ी सिर्फ 200 रुपए
बच्चों ने बताया कि उन्हें सुबह चाय के साथ टोस्ट दिया जाता है और इसके बाद काम पर लगा दिया जाता है। दिनभर में उन्हें चूड़ियों के 25 बंडल तैयार करने का लक्ष्य दिया जाता है। इतना काम पूरा करने के बदले करीब 200 रुपए दिहाड़ी मिलने की बात उन्होंने कही।
बच्चों के मुताबिक, काम के दौरान तबीयत खराब होने पर उन्हें अपनी दवा का इंतजाम खुद करना पड़ता है। इसके लिए वे मेडिकल स्टोर से दवाइयां लेते हैं। यदि बच्चों के ये बयान जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह उनकी देखभाल, स्वास्थ्य और श्रम की परिस्थितियों को लेकर गंभीर चिंता का विषय है।
लंबे समय तक काम से हाथों पर असर
रिपोर्ट में सामने आया कि लगातार कई घंटे तक चूड़ियां बनाने का काम करने से कुछ बच्चों की अंगुलियां टेढ़ी हो गई हैं। कम उम्र में हाथों से लगातार बारीक और दोहराव वाला काम करना शारीरिक परेशानी बढ़ा सकता है। ऐसे में बच्चों के स्वास्थ्य की जांच और उनकी सुरक्षित देखभाल जरूरी है।
बालश्रम रोकने के लिए कार्रवाई जरूरी
बिहार से बच्चों को जयपुर लाकर काम कराने के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यह पता लगाया जाना चाहिए कि बच्चों को कौन लेकर आया, उन्हें कहां रखा गया और काम कराने के पीछे किन लोगों की भूमिका है। साथ ही, बच्चों की उम्र, काम के घंटे, भुगतान और रहने की परिस्थितियों की भी जांच होनी चाहिए।
भारत में बालश्रम से संबंधित कानून बच्चों को खतरनाक और प्रतिबंधित कार्यों में लगाने पर रोक लगाते हैं। यदि नाबालिगों से गैरकानूनी तरीके से काम कराया जा रहा है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
सबसे अहम सवाल यह है कि जिन बच्चों की उम्र पढ़ने, खेलने और अपना भविष्य बनाने की है, वे इतनी कम उम्र में लंबे समय तक मजदूरी करने को मजबूर क्यों हैं? इस मामले में बच्चों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना, उनकी शिक्षा सुनिश्चित करना और कथित बालश्रम के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

