सूरत का नाम आते ही जेहन में हीरे और रंग-बिरंगी साड़ियों की तस्वीर उभरती है। गुजरात का यह शहर आज सिंथेटिक कपड़ों, कढ़ाई, प्रिंटिंग और साड़ी कारोबार के बड़े केंद्रों में शामिल है। लेकिन सूरत की कहानी सिर्फ आधुनिक पावरलूम और कपड़ा बाजारों की नहीं है। इसकी जड़ें मुगलकालीन समुद्री व्यापार से जुड़ी हैं, जब यहां से कपड़े और दूसरे सामान विदेशों तक भेजे जाते थे।
गुजरात का सूरत व्यापारिक रूप से बहुत समृद्ध है जिसकी एक बड़ी वजह उसकी भौगोलिक स्थिति थी। यह तापी नदी के किनारे बसा था और अरब सागर के समुद्री व्यापार से जुड़ा हुआ था। मुगलकाल में सूरत एक महत्वपूर्ण बंदरगाह और बिजनेस हब बन गया था। यहां भारतीय और विदेशी व्यापारी कारोबार करते थे।
उस दौर में सूरत की पहचान सिर्फ आज की तरह सिंथेटिक साड़ियों से नहीं थी। यहां रेशमी कपड़ों पर सोने-चांदी के तारों से बारीक डिजाइन बनाने की परंपरा थी। ऐसे कपड़ों को किंखाब (Kinkhab) या ब्रोकेड कहा जाता था। इन पर जरी का काम किया जाता था। सूरत से रंगीन कपड़े, सजावटी कपड़े और दूसरे वस्त्र भी विदेशों में भेजे जाते थे।
सूरत के इतिहास का एक अहम मोड़ 1608 में आया, जब ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से कैप्टन विलियम हॉकिन्स भारत पहुंचे। वे मुगल बादशाह जहांगीर के दरबार से अंग्रेज व्यापारियों के लिए व्यापार की अनुमति हासिल करना चाहते थे। हालांकि, शुरुआत में उन्हें पुर्तगालियों के विरोध और स्थानीय अधिकारियों की अड़चनों का सामना करना पड़ा।
कई पुराने लेखों से पता चलता है कि 1612 को कैप्टन थॉमस बेस्ट अपने जहाजों के साथ सूरत पहुंचे। उसी साल अंग्रेजों और पुर्तगालियों के बीच सूरत के पास समुद्री संघर्ष हुआ, जिसमें अंग्रेजों को सफलता मिली। इसके बाद अंग्रेजों के लिए यहां व्यापारिक ठिकाना स्थापित करना आसान हुआ। सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थायी फैक्टरी की स्थापना आम तौर पर 1612-13 के दौर से जोड़ी जाती है।
बता दें कि उस समय फैक्टरी का मतलब आज की तरह उत्पादन करने वाला कारखाना नहीं था। अंग्रेजी व्यापारिक व्यवस्था में यह ऐसा ठिकाना होता था जहां कंपनी के एजेंट रहते, सामान खरीदते, उसका भंडारण करते और विदेश भेजने के लिए व्यापार का मैनेजमेंट करते थे।
सूरत से कंपनी को सूती कपड़े, रेशमी वस्त्र, नील और दूसरे व्यापारिक सामान जुटाने में मदद मिली। मुगलकालीन व्यापारिक नेटवर्क और स्थानीय भारतीय व्यापारियों की भूमिका भी इसमें अहम थी।
हाथकरघे से पावरलूम तक कैसे पहुंचा साड़ी उद्योग?
सूरत की मौजूदा साड़ी इंडस्ट्री को समझने के लिए 19वीं और 20वीं सदी के इंडस्ट्रियल बदलावों को देखना जरूरी है। सूरत के टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े सरकारी दस्तावेज के अनुसार, शहर में पहली टेक्सटाइल मिल “जफरअली मिल 1861” में स्थापित हुई। इससे शहर में मशीन आधारित गारमेंट प्रोडक्शन के विकास को गति मिली।
1935–37 के आसपास इंपोर्टेड आर्टिफिशियलस रेशे पर भारी शुल्क के दौर में सूरत के घरेलू कपड़ा उद्योग को बढ़ावा मिला। दूसरे विश्व युद्ध के समय तक शहर में करीब 1,200 पावरलूम लग चुके थे।
1960 के दशक के बाद सूरत में सिंथेटिक साड़ियों का विस्तार हुआ। पावरलूम पर रेशमी कपड़े और साड़ियां बुनने का काम बढ़ा। बाद में पॉलिएस्टर जैसे सिंथेटिक रेशों के इस्तेमाल ने प्रोडक्शन को और विस्तार दिया। सस्ती और अलग-अलग डिजाइन वाली साड़ियों के बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग में इस बदलाव की अहम भूमिका रही।
कैसे बना सूरत साड़ियों का समंदर?
सूरत की खासियत सिर्फ साड़ी बुनना नहीं, बल्कि कपड़े को तैयार उत्पाद में बदलने वाली पूरी इंडस्ट्रियल व्यवस्था है। यहां धागे को टेक्सचर देने, कपड़ा बुनने, रंगाई, प्रिंटिंग, कढ़ाई और फिनिशिंग से लेकर थोक कारोबार तक कई गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ी हैं।
इस व्यवस्था ने छोटे उद्यमियों को भी कारोबार शुरू करने के मौके दिए। एक यूनिट कपड़ा बुन सकती है, दूसरी उसकी रंगाई और प्रिंटिंग कर सकती है, जबकि तीसरी कढ़ाई या फिनिशिंग का काम करती है। इसके बाद व्यापारी तैयार साड़ियों और ड्रेस मटीरियल को देश के अलग-अलग बाजारों में भेजते हैं।
भारत सरकार के ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के औद्योगिक क्लस्टर संबंधी रिकॉर्ड में सूरत को देश के प्रमुख मैन-मेड फैब्रिक केंद्रों में शामिल किया गया है। इस क्लस्टर की पहचान पावरलूम, सिंथेटिक साड़ियों, ड्रेस मटीरियल और कपड़ा प्रोसेसिंग यूनिट्स हैं। यही वजह है कि सूरत का कारोबार सिर्फ बुनकरों तक सीमित नहीं है। इसमें धागा बनाने वाली कंपनियां, मशीन ऑपरेट, रंगाई-छपाई यूनिट्स, डिजाइनर, कढ़ाई कारीगर, थोक व्यापारी और ट्रांसपोर्टिंग से जुड़े लोग भी शामिल हैं।
सूरत कारोबार का केंद्र
सूरत की यात्रा को तीन बड़े बदलावों में समझा जा सकता है। पहले समुद्री व्यापार ने शहर को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा। फिर मुगलकालीन दौर में जरी, रेशमी कपड़ों और दूसरे फेबरिक की पहचान मजबूत हुई। इसके बाद 20वीं सदी में पावरलूम और सिंथेटिक कपड़ों के विस्तार ने इसे बड़े पैमाने पर साड़ी उत्पादन का केंद्र बना दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत की साड़ी इंडस्ट्री में हस्तक्षेप से पहले शहर के विकसित व्यापारिक इतिहास का एक अध्याय शुरू हो चुका था।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

