यूपी पुलिस में जाने का सपना देख रहे 23 साल के हर्ष की अटकी सांसें, 55 लाख बिक चुके, अब जिंदगी बचाने को चाहिए 60 लाख
कभी घर में हर्ष यादव और उसके छोटे भाई रिशव की बातों में यूपी पुलिस की भर्ती, दौड़ और खाकी वर्दी का सपना हुआ करता था। दोनों भाई तैयारी कर रहे थे। परिवार को उम्मीद थी कि मेहनत रंग लाएगी और एक दिन दोनों बेटे पुलिस की वर्दी में नजर आएंगे। लेकिन 10 जून 2026 को अचानक आई बीमारी ने परिवार की पूरी तस्वीर बदल दी। जिस बेटे के हाथ में किताब और आंखों में नौकरी का सपना था, आज उसी की सांसें बचाने के लिए परिवार अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी लगा चुका है।
घर में इसी उम्मीद के साथ पढ़ाई चल रही थी, लेकिन हर्ष की तबीयत बिगड़ने के बाद परिवार की सारी चिंता एक ही सवाल पर टिक गई है कि बेटे का इलाज कैसे पूरा होगा। 10 जून को अचानक हर्ष के सीने में तेज दर्द हुआ। दर्द बढ़ता गया तो वह घर लौट आया।
परिजन उसे रामपुर लेकर पहुंचे। जांच में फेफड़ों में पानी आने की बात सामने आई। कुछ दिन अस्पताल में भर्ती रहने के बाद परिवार ने बेहतर इलाज के लिए सांसद के पत्र पर दिल्ली एम्स पहुंचने का प्रयास किया। बावजूद वहां उपचार नहीं हो सका।
इसके बाद मजबूरी में हर्ष को गुरुग्राम के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसका आपरेशन हुआ। कुछ दिन बाद तबीयत में सुधार दिखा तो परिजन उसे घर ले आए। परिवार को लगा कि अब मुश्किल समय पीछे छूट गया है, लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी।
हर्ष को फिर तेज बुखार आया और तबीयत बिगड़ने लगी। परिवार उसे दोबारा गुरुग्राम लेकर पहुंचा। परिजनों के अनुसार, डाॅक्टरों ने फिर ऑपरेशन किया। फेफड़ों में जमा संक्रमण का द्रव बाहर निकालने के लिए बैग लगाया गया है। इलाज ने परिवार की आर्थिक रीढ़ भी तोड़ दी।
माता-पिता ने वर्षों में जो भी पैसा जोड़ा था, वह बेटे के इलाज में लगा दिया। घर में रखे जेवर बेचने पड़े। इसके बाद रिश्तेदारों और मिलने वालों ने मदद का हाथ बढ़ाया। किसी ने अपनी क्षमता के अनुसार रकम दी तो किसी ने इलाज जारी रखने के लिए सहयोग किया।
करीब 55 लाख रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं लेकिन, बीमारी का खर्च अभी खत्म नहीं हुआ है। परिजनों के मुताबिक, डाक्टरों ने करीब छह माह और इलाज चलने की बात कही है, जिस पर लगभग 60 लाख रुपये और खर्च होने का अनुमान है।
इतनी बड़ी रकम अब परिवार के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गई है। परिजनों ने विधायक और सांसद से भी आर्थिक सहायता की गुहार लगाई, लेकिन अभी तक मदद नहीं मिली है। अब परिवार की सरकार से एक ही मांग है कि हर्ष की जिंदगी बचाने में मदद की जाए।
पिता के सामने बेटे का इलाज कराने की मजबूरी है और मां की आंखों के सामने बेटे का भविष्य। परिवार कहता है कि उसे नौकरी नहीं, फिलहाल सिर्फ अपने बेटे की जिंदगी चाहिए। खाकी वर्दी का सपना बाद में भी पूरा हो सकता है, पहले हर्ष की सांसें बच जाएं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

